किस्सा किस्सा लखनऊवा

जब भी लखनऊ का ज़िक्र आता है तो चर्चा अक्सर लखनऊ के नवाबों की ही होती है और अब तक मैं भी यही समझता रहा कि लखनऊ और अवध की पहचान नवाबों से ही है। लगभग दो माह पहले ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर हिंदी साहित्य उत्सव के दौरान “किस्सा किस्सा लखनऊवा” हाथ लग गई और सोने पर सुहागा यह कि किताब के लेखक और मशहूर दास्तानगो हिमांशु बाजपेई ने मेरी गुज़ारिश पर अपना ऑटोग्राफ भी दे डाला और साथ ही साथ ये उम्मीद जताई कि किताब मुझे लखनऊ के करीब लाएगी। जब किताब पढ़नी शुरू की तो सफेद कागज पर काली स्याही से लिखे किस्से को पढ़ रहा था लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया तो ऐसा लगा मानो हिमांशु बाजपेई का चेहरा किताब के पन्नों पर उभर आया हो और वो खुद ही किस्से पे किस्से सुनाए चले जा रहे हों। लेखक का पाठक पर ऐसा नियंत्रण पहले कभी महसूस नहीं किया जैसा “किस्सा किस्सा लखनऊवा” पढ़ते हुए मैंने खुद महसूस किया, जहाँ लेखक चाहता है कि आप किताब को धीमे पढ़े वहाँ आप किताब को तेजी से नहीं पढ़ सकते और जहाँ लेखक चाहता है कि आप तेज गति से पढ़े वहाँ आप धीमी गति से नहीं पढ़ सकते और अगर यह कहूँ कि किताब पढ़ते-पढ़ते आप कब खुद ही अपने लिए क़िस्सागो बन जाते हैं मालूम ही नहीं चलता।

तो यह तो बात रही कि किस तरह किताब पाठक को अपने मोहपाश में जकड़ कर रखती है। अब बात करते हैं कि किताब अपने उद्देश्य में कितनी सफल होती दिखाई देती है। बताना चाहूँगा कि जहाँ एक ओर किताब अवध और लखनऊ की संस्कृति को मशहूर शाइरों, कलाकारों, गायक, नर्तकों, संगीतकारों, साहित्यकारों के किस्सों के ज़रिए पाठकों तक पहुँचाती है वहीं दूसरी और वज़ीरों, सिपाहियों, फकीरों व आम लोगों के किस्सों के ज़रिए तत्कालीन राजनैतिक व सामाजिक परिस्थितियों की भी एक तस्वीर उकेरती नज़र आती है। नवाबों का जिक्र भी भरपूर है लेकिन किस्सों का केंद्र बिंदु एक आम नागरिक ही है।

किताब लखनऊ के बारें में है तो लाज़मी है कि उर्दू के शब्दों की भरमार तो होगी ही। अब कुछ शब्द तो ऐसे हैं जो मुझ जैसे के सिर के ऊपर से उतर जाएं और कुछ ऐसे की अगर समझने की कोशिश करते है तो ऐसे पकड़ से निकल जाते हैं जैसे मुट्ठी से रेत लेकिन लेखन की खासियत कहिए कि फिर भी हर कहानी का भाव अच्छी तरह समझ में आ ही जाता है।

कुल मिलाकर किताब किस्सों को इस तरह पेश करती है कि अवध और लखनऊ के हर खास और आम के बारें ना केवल जानकारी देती है बल्कि वहाँ की सभ्यता और संस्कृति में उनका क्या योगदान है उसको भी रेखांकित करती है और कहने की ज़रूरत नहीं कि भरपूर मनोरंजन की गारंटी तो है ही।

सचिन देव शर्मा

Advertisements