पालतू बोहेमियन – पुस्तक समीक्षा

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यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर: | तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ||

हे राजन! जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव–धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है– ऐसा मेरा मत है।

यूँ तो पालतू बोहेमियन मनोहर श्याम जोशी जी के जीवन के वो संस्मरण हैं जिनकी गवाही प्रभात रंजन जी ने अपनी कलम से लिख कर दी है लेकिन वास्तव में वो हर उस गुरु की कहानी है जो अपने शिष्य को चेला नहीं शिष्य बनाना चाहता है और बनाता भी है। जो अपने शिष्य को सफलता की कोई घुट्टी नहीं पिलाता बल्कि उसे एक सफल लेखक बनने की प्रक्रिया में डाल देता है। वह प्रक्रिया जो अपने समय से पूरी होती है वह प्रक्रिया जिसमे उत्प्रेरक का कोई स्थान नहीं। जहाँ गुरु की प्रशंसा अवश्यम्भावी है वहीं शिष्य भी प्रशंसा के पात्र हैं जिसने हमेशा उस मार्ग का सम्मान किया जो गुरु ने उसके लिए चुना। प्रथम अध्याय पढ़कर कहीं ना कहीं गोलमाल फिल्म के अमोल पालेकर की याद भी ताज़ा हो उठती है जो अपने “बॉस” को प्रभावित करने के लिए तरह तरह के उपक्रम करता है। कभी कभी लगता है ये पुस्तक एक संस्मरण ही नहीं बल्कि अंग्रेजी उपन्यासों का एक इनसाइक्लोपीडिया भी है। कुल मिलाकर नए लेखकों के लिए एक सेल्फ हेल्प गाइड भी है पालतू बोहेमियन। अस्सी और नब्बे के दशक में मनोरंजन के क्षेत्र में हो रहे बदलाव की बानगी भी है और उस समय के स्थापित लेखकों के जीवन के कुछ अनजाने पहलुओं को पाठकों के लिए परोसकर उनके सामान्य ज्ञान को बढ़ाने की कुंजी भी और साथ ही साथ बयाँ करती है उस समय के मनोरंजन व् साहित्य की दुनिया के समीकरणों को भी।

जोशी जी के व्यक्तित्व के सभी पहलुओं की प्रमेय को आसान से उदाहरणों से समझाती एक “मेड इजी” भी है पालतू बोहेमियन। “प्रिंसली इम्पोस्टर” व “कलिकथा” के प्रसंग से तार्किकता के ऊपर अलौकिकता के महत्व को बड़ी ही आसानी से बयान किया है जोशी जी ने। जहाँ प्रभात रंजन जी ने जगह-जगह पर अपनी स्वीकारोक्ति से पूरे संस्मरण को एक प्रमाणिकता प्रदान की है वहीं जोशी जी की साफगोई भी इस बात से साफ ज़ाहिर होती है जब वो हँसते हुए बोलते हैं “मुदर्रसी मुबारक हो ! मैं तो तुमको विद्रोही समझता था लेकिन तुम भी हिंदी वाले ही निकले। हिंदी के लेखकों का सारा संघर्ष नौकरी पाने तक ही होता है। ख़ुशी अपनी जगह है लेकिन मुझे दुःख हो रहा है कि तुम मध्यमवर्गीय मानकों से ऊपर नहीं उठ पाए”। एक स्थापित लेखक होने के बावजूद और यह समझते हुए भी कि सफलता का फार्मूला क्या है उन्होंने अपने आप को मसाला पटकथा से दूर रखा और कम्बोडिया जैसे सुन्दर देश का यात्रावृत्तान्त इसलिए नहीं लिखा क्योंकि तुओल स्लेंग म्यूजियम में पोल पाट द्वारा करवाए गए नरसंहार के प्रतीकों को देख वो भावविह्ल हो उठे और यात्रवृत्तांत लिखने का इरादा त्याग दिया। उनकी दूरदर्शिता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है जब वो प्रभात जी को आने वाले समय में हिंदी के बढ़ने वाले बाज़ार के बारे में बता कर उन्हें अनुवाद के काम में लग जाने की सलाह देते हैं।

जिस सफलता के साथ श्री मनोहर श्याम जोशी जी जैसे बहुविध व्यक्तित्व का चित्रण क़िताब में किया गया है वह चित्रण प्रभात जी जैसा मंझा हुआ लेख़क ही कर सकता है। बिना किसी लाग-लपेट के जन मानस की भाषा में किताब को लिखकर प्रभात जी ने हिंदी के पाठकों को कृतज्ञ कर दिया है। श्री पुष्पेश पंत द्वारा लिखी गई प्रस्तावना ने किताब में जोशी जी के “कुमाऊं कनेक्शन” का छोंक लगाकर किताब को और पठनीय बना दिया है।

कोई कसर अगर रह गई है तो बस वो यही है की किताब एक सौ छत्तीस पेज में पूरी हो जाती है और अगर कोई चीज़ पूरी नहीं होती तो वो है जोशी जी व् प्रभात जी के बीच की केमिस्ट्री का और अधिक रसास्वादन करने की चाह।

 

-सचिन देव शर्मा

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