समीक्षा – “मैं एक और भी हूँ”

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“मैं एक और भी हूँ” पंकज दीक्षित जी की ऐसी कृति है जिसकी काव्य रचनाओं को जब जोड़कर कर पढ़ा जाता है तो रचनाएँ संग्रह की सार्थकता को पूर्णमासी के चाँद की तरह पूर्णता देती हैं, प्रेमी और प्रेमिका के बीच का आकर्षण कामना व भावना के अंतर्द्वंद से निकल पवित्र प्रेम के रूप में स्थापित हो उठता है। रचनाओं में प्रेम को पा लेने की जद्दोजहद तो है लेकिन प्रेमिका के सपनों को अपने सुख का परित्याग करके पूर्ण करने का संकल्प भी नज़र आता है। उसके लिए प्रेमिका का रूप रंग माइने नहीं रखता बल्कि उसका एहसास उसके प्रेम की सुगंध उसे संतोष देती है, अपनी प्रेमिका का नाम जपना ही उसका धर्म बन जाता है। वो सुख में भी दुख की कामना करता है क्योंकि उसका अपना प्रेम दुख में है वो उसके पास जाना चाहता है।

यह काव्य संग्रह भावनाओं का एक ऐसा समंदर है जिसमें ज्वार-भाटा कभी थमने का नाम नहीं लेता। कभी असफलताओं के चलते अपने आप पर संदेह होने लगता है तो कभी पुराने दर्द के फ़िर से उभर आने का डर सताने लगता है तो कभी ग़म के ना रह जाने का शूल है। भविष्य की चिंताओं को तिलांजलि दे वर्तमान को जीने की जिजीविषा परिलक्षित है, कवि को मिट जाने की परवाह नहीं बल्कि चुनौतियों का सामना करने की ललक है। कभी अकेले रह जाने का भय नज़र आता है तो कभी वो वह महसूस करता है जो और कोई महसूस नहीं कर पाता।

कोई कविता साकार-निराकार के परस्पर विरोधाभास को दर्शाती है तो कोई आत्मा को जीवन की नदी के तट की मान्यता देती है जिससे भाव आकर टकराते हैं और वापस चले जाते हैं और यह क्रम अनंत बन कर रह जाता है। कविताओं में कवि विभिन्न मानवीय संबंधों के विषय में अपनी भावनाओं को कागज़ पर परोसता है तो कभी संबंधों के टूटने के कारणों को काटों की तरह चुनकर अपने जीवन से बाहर फेंक देता है।

पंकज जी ने माता, पिता, बेटी, दोस्त, प्रेमिका आदि जैसे संबंधों को महसूस किया है और जिस शिद्दत से महसूस किया है उसी शिद्दत से लिखा भी है जो पाठक को अपने जादू से अछूता नहीं जाने देता। यूँ भी कह सकते हैं कि मानवीय संबंधों के जटिल प्रश्नों की कुंजी है यह संग्रह।

इसमें त्यौहार का उल्लास है, अपने शहर की मिट्टी की खुश्बू है, देश है, विदेश का काव्यात्मक यात्रावृत्तान्त है, ग़ालिब है, कवि है, कशिश है, सपने हैं, संवेदना है, तन्हाई है, डर है, व्यथा है, ऋतुएं हैं, अस्तित्व है, मनोभाव है, दर्द है, प्रेम है, जिज्ञासाएं हैं, लालसा है। संग्रह व्यक्ति के जीवन के उन सभी पहलुओं को नब्बे कविताओं में समेटता एक ग्रंथ है जो इंसान की जिंदगी के हर क्षण का प्रतिबिम्ब है।

-सचिन देव शर्मा