कोलकाता कार्यालय में एक दिन

फरवरी 2018: “मे आई कम इन”? उपाध्यक्ष (मानव संसाधन) के केबिन का दरवाजा खटखटाते हुए मैंने पूछा? ‘आ जाओ’ उन्होंने मेरी तरफ देखते हुए कहा। ” कोलकाता आफिस का फैमिली डे कैसा रहा” मैंने उनकी तरफ देखते हुए उनसे पूछा। अपने लैपटॉप की तरफ देखते-देखते ही उन्होंने जवाब दिया “अच्छा रहा और हाँ सिंह साहब तुम्हे कोलकाता मैराथन में प्रतिभागिता कर रहे वहाँ के कर्मचारियों का प्रोत्साहन करने के लिए बुला रहे हैं, चले जाओ अच्छा रहेगा”। “ठीक है” मैंने सहमति में सिर हिलाते हुए बोला, मैराथन रविवार 4 फरवरी की है, शनिवार 3 फरवरी को चला जाता हूँ। उन्होंने बोला एक काम करो एक दिन और पहले चले जाओ आफिस में भी सब से मिल आना। मानव संसाधन विभाग में होने के कारण व एम्प्लोयी इंगेजमेंट का कार्य मेरे पास होने से मुझे ही जाना था। शनिवार या रविवार को सभी से मिलना संभव नही था क्योंकि शनिवार, रविवार का साप्ताहिक अवकाश रहता है और सब कर्मचारी मैराथन मैं प्रतिभागिता नही कर रहे थे और वैसे भी कार्य संबंधित विषयों पर विचार विमर्श कार्यालय में ही संभव हो पाता है। इसलिये शुक्रवार, 2 फरवरी को जाने का और रविवार, 4 फरवरी को वापस आने का कार्यक्रम तय हो गया।

2 फरवरी को सुबह 8 बजे की फ्लाइट लेकर तकरीबन 10:30 बजे कोलकता पहुँच गया। वहाँ से टैक्सी पकड़कर होटेल पहुँचा, सामान होटेल में रखा और पैदल ही कार्यालय की तरफ चल दिया। कोलकाता कार्यालय में मानव संसाधन विभाग में कार्यरत वहाँ के सहयोगी श्रीमान पिल्लई से लगातार फ़ोन के द्वारा संपर्क में था, उन्होंने फ़ोन पर ही होटल से कार्यालय तक पहुचने का रास्ता समझा दिया था। होटल से कार्यालय पास ही में था, वाकिंग डिस्टेंस। कोलकाता का नया व्यावसायिक केंद्र समझा जाने वाला साल्ट लेक इलाका। वही गुरुग्राम की तरफ विशालकाय गगनचुम्बी इमारतें, सड़कें दिल्ली और गुरुग्राम की तरह चौड़ी तो नही हैं लेकिन कुल मिलाकर एक समकालीन व्यापारिक केंद्र की परिभाषा में खरे उतरने की जद्दोजहद में लगा जान पड़ता है। पांच मिनट में ही कार्यालय के उस विशाल इमारत के सामने अपने आप को पाया। “आर डी बी बोलेवार्ड” इमारत की दोनों एंट्रीज के बीच बड़े बड़े उभरे अंग्रेजी अक्षरों में लिखा ईमारत का नाम मानो कह रहा हो कि मैं भी लंदन या न्यूयॉर्क की किसी आलीशान व्यावसायिक इमारत से कम नहीं। एक अजीब सा नयापन था उस जगह में, बहुत ही चहल-पहल दिखाई पड़ रही थी। खाने पीने के लिए बहुत से रेस्टोरेंट, पान-बीड़ी-सिगरेट के खोखे और सबसे भिन्न तो ये था कि हमारे कार्यालय की इमारत के ही एक हिस्से में सिनेमाघर भी मौजूद था। ना चाहते हुए भी कहीं ना कहीं एक ईर्ष्या भाव मन में आ ही रहा था और मन ये सोचने पर मजबूर हुआ जा रहा था कि काश गुरुग्राम कार्यालय के आसपास भी यही सुविधाएं उपलब्ध होतीं। ये सब दिमाग में चल ही रहा था कि मैंने अपने आप को लिफ्ट लॉबी में पाया। विभिन्न कार्यालयों के नामों की पट्टी कार्यालयों के तल के क्रमांक के साथ लिफ्ट लॉबी में बाएं ओर लगी थी। ऊपर से नीचे पट्टी पर लिखे कार्यलयों के नाम पड़ने लगा, अचानक अपने कार्यालय का नाम व तल का क्रमांक पढ़ लिफ्ट की तरफ बढ़ चला। लिफ्ट से तल तक पहुँचकर जैसे ही कार्यालय के मुख्य द्वार तक पहुँचा, द्वार पर खड़ा गार्ड सजग हो उठा, शायद उसको सूचना थी मेरे आने की, ऐसा लगा कि वो मेरा नाम पूछना चाहता है लेकिन शायद हिम्मत नहीं कर पा रहा है। उसने नाम पूछने का विकल्प निकाल ही लिया, बोला सर् आप कहा से आये हैं, मैंने कहा गुरुग्राम कार्यालय से, वो समझ गया। बैठेने का इशारा करते हुए एंट्री रेजिस्टर मेरी और बढ़ाया और केवल नाम लिखने और हस्ताक्षर करने का अनुरोध किया। मैंने फटाफट हस्ताक्षर किए और श्रीमान पिल्लई के बारे में पूछा, उसने डेस्क की ओर इशारा किया। इतने ही एक दूसरे सहकर्मी नंदी जी आ पहुचे जो मुझसे पहले से ही परिचित थे। कार्यालय की रूपरेखा गुरुग्राम कार्यालय से मिलती जुलती हुए ही है, असल में हमारे सभी कार्यालयों की रूपरेखा मिलती जुलती ही है, आसपास की इमारतें पास-पास में होने के कारण ऐसा जान पड़ता है कि सामने वाली इमारत हमारे कार्यालय के अंदर ताका झांकी करने की कोशिश कर रही है। पिल्लई की आवाज से पड़ोसी ईमारतों से ध्यान हठा। पिछले साल नवंबर में जब वो टीम के साथ कंपनी के फुटबॉल टूर्नामेंट में प्रतिभागिता करने के लिए दिल्ली आए थे तब मुलाकात हुई थी, लगभग तीन महीने बाद उनसे मिलने पर अच्छा अनुभव हो रहा था वो पहले गुरुग्राम कार्यालय में भी काम कर चुके हैं। उनके साथ बैठकर दिन भर के कार्यक्रम की सूची तैयार की। काम को देखते हुए समय की थोड़ी कमी थी इसलिए शीघ्र ही काम पर लगना था। पिल्लई बोले कि पहले सिंह साहब से मिल लेतें है, सिंह साहब कोलकाता कार्यालय के हैड हैं। पहले वो भी गुरुग्राम कार्यालय में ही थे, मेरे पहले से ही उनसे अच्छे संबंध रहे हैं। उनसे मुलाकत में काम के बारें में उनसे चर्चा कर लंच रूम की ओर चल पड़े।

लंच रूम में अटेंडेंट ने खाना लगाया। कोलकाता कार्यालय में मांसाहारी भोजन की भी व्यवस्था है, अटेंडेंट माँसाहारी भोजन परोसता उससे पहले ही मैंने ना कि मुद्रा में हाथ आगे करते हुए उसे रुकने का इशारा किया, वो समझ गया। खाना स्वादिष्ट था, पेट भर खाया, भूख भी लग आयी थी तब तक। लंच के बाद मैं और पिल्लई चहलकदमी के लिए कार्यालय से निकल कर इलाके की पार्किंग तक पहुँचे। कोलकाता में सब कुछ अलग सा जान पड़ता है, गुरुग्राम में तो शायद ऐसा सोच पाना भी संभव नहीं। पार्किंग एक सुंदर झील के किनारे पर स्तिथ है, शाम के समय वहाँ का दृश्य कितना मनोरम रहता होगा, मैं उस दृश्य को मस्तिष्क के पटल पर अपनी कल्पना से अंकित करने का प्रयास कर रहा था, लेकिन वापस कार्यालय जाने का ख्याल आते ही उस दृश्य की चित्रकारी अधूरी ही रह गए। वापस कार्यालय पहुंचे, पहुचकर कुछ वरिष्ठ सहकर्मियों से कार्य संबंधी चर्चा करनी थी, एक एक कर सभी से चर्चा की। निकलते बढ़ते हुए सभी लोगों से मुलाकात करने की कोशिश में किसी से मिल पाया किसी से नही। वहां के लगभग सभी सहकर्मी मुझे पहचानते है और जो नही पहचानते वो पहचानने की कोशिश करते नज़र आ रहे थे। उस दिन वहाँ पर कर्मचारियों का जन्मदिन मनाने का भी अवसर था। उसमें भी प्रतिभागिता की जिससे और भी लोगो से मुलाकात का मौका मिल गया। अब रविवार को होने वाली कोलकाता मैराथन में प्रतिभागिता कर रहे सहकर्मियों को सभी संबंधित सूचना देने, उन्हें मैराथन के लिए प्रोत्साहित करने, कंपनी के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की शुभकामनाएं व संदेश देने के लिए मैंने मीटिंग का आयोजन किया था और मैराथन के लिए वर्दी का वितरण भी तभी होना था, मैराथन से पहले दिन शनिवार को क्रिकेट टूर्नामेंट भी था उसकी तैयारियां भी जोर शोर से चल रही थी, मुझे भी क्रिकेट मैच में अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। मीटिंग के बाद एक और साथी श्री कृष्णपदा चंदा से बातचीत के दौरान मालूम चला कि उन्होंने भी एक मोटिवेशनल किताब लिखी है जो कि उन्होंने मुझे भेंट भी की, जानकर अच्छा लगा कि कार्यालय में ऐसे लोग भी हैं जो किताब लिखने की भी क्षमता रखतें हैं। अब सब कार्य निपटाने के बाद एक बार फिर सिंह साहब के साथ वहाँ के कर्मचारियों के विचारों के विषय में अपने आकलन की चर्चा पिल्लई के साथ मिलकर उनसे करनी थी। सब कार्यों को निबटाने के बाद अब तक शायद साढ़े सात बज चुके थे। यात्रा और सारे दिन के काम की थकान से आराम करने का मन था। सिंह साहब से विदा लेते हुए मैं और पिल्लई कार्यालय से निकल पड़े। कल क्रिकेट मैच में तो प्रतिभागिता करनी ही थी और साथ साथ ये भी देखना था कि कोलकाता दर्शन के लिए भी कुछ समय निकल पाता है या नहीं।

सचिन देव शर्मा

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