एक सफर ऐसा भी

वो पूरी बाँह का खाकी रंग का स्वेटर, मेरी याद में शायद वो आखिरी कपड़ा था जो मेरी माँ ने मुझे दिलाया था और उनके गुजर जाने के बाद वो उस याद की तरह मेरे मन में समा गया जिस्से अगर निकलना भी चाहूँ तो नाकाम ही रहूँगा।जिस तरह एक माँ बच्चे को अपने आँचल में सिमेट कर ठंड से बचाती है ठीक उसी तरह उस स्वेटर ने मुझे बरसों तक ठंड से बचाये रखा, अगर दूसरे शब्दों में कहूँ तो ये होता है स्वेटर का माँ बन जाना। उसे पहनकर मैं आत्मविश्वास से भर जाता था। एक छोटे से कस्बे में रहने वाले शिक्षक पिता के लिए अपने दो बच्चों को बड़े शहरों में उच्च शिक्षा दिलाना शायद असंभव कार्य तो नहीं था लेकिन मुश्किल बहुत था। कॉलेज-हॉस्टल की फीस, कॉपी-किताबों का खर्चा निकालने के बाद कुछ बचता ही नही था जो नए कपड़ों के बारें में सोचा जाए।ऐसे समय में वो स्वेटर उस आशीष की तरह था जो माँ ने दुनिया से विदा लेते लेते मुझे दिया था। उस आशीर्वाद ने हमें तरक्की दी, स्वाभिमान से जीने के काबिल बनाया और उसके बाद भी कई बरसों तक उस स्वेटर ने मुझे माँ के आंचल की कमी महसूस ना होने दी। अब मेरे पास स्वेटर्स तो बहुत थे लेकिन माँ की खुशबू तो उसी खाकी रंग के स्वेटर से ही आती थी। मुश्किल तो बहुत था लेकिन खुदगर्ज़ी मुझे मेरी माँ ने सिखाई ना थी, क्या माँ के प्यार और उस स्वेटर पर मेरा ही हक़ है? क्या वो स्वेटर किसी और को उष्मा नही दे सकता? क्या मेरी माँ की ममता किसी और जरुरतमंद को उनकी स्नेह की छांव नहीं दे पाएगी?ये वो सवाल थे जो उस स्वेटर को किसी जरूरतमंद को देने से पहले मेरे दिमाग में चलते रहे। लेकिन किसी का जरुरतमंद दिखना और किसी का जरुरतमंद होना दो अलग-अलग बातें हैं। जब मुझे पता चला कि “गूंज” वो संस्था है जो चीज़ों को जरूरतमंद के पास पहुँचा सकती है तो अपने उस खाकी रंग के प्यारे से स्वेटर को “गूंज” के हवाले कर दिया। दुख तो था लेकिन साथ ही साथ एक संतुष्टि भी थी।

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उस दिन मेरी बिटिया का पहला जन्म दिन था। उस मोतियों से सजी स्लीवलैस हल्के गुलाबी रंग की फ्रॉक में वो किसी परी से कम नहीं दिख रही थी। थी तो एक ही साल की लेकिन उस गुलाबी पोशाक को पहनकर किसी किशोरी की तरह इठलाने में लगी थी, लिफ्ट में लगे शीशे में अपने आप को निहारती। वो पल मेरी ज़िंदगी का एक अहम और खुशनुमा पल था, जिसे उस गुलाबी रंग के फ्रॉक ने और खुशनुमा रंग में रंग दिया था, ना जाने कहाँ कहाँ भटके थे उस परीयों जैसे लिबास को खरीदने के लिए। यूँ तो बिटिया अब दस साल की हो चुकी है लेकिन उस गुलाबी फ्रॉक में एक साल की बिटिया की छवि आज भी हमारे बेडरूम की दीवार पर दरवाजे के ठीक सामने लगी है और हाँ, हमारे दिलों की दीवारों पर भी। उसकी मम्मी बरसों तक उस पोशाक को सन्दूक में सहेज कर रखती रही। जब भी वो गर्मी या सर्दी के कपड़ों को रखती या निकालती तो बिटिया के पहले जन्मदिन की यादें ताजा हो उठती, लेकिन फिर एक ख्याल आता कि जन्मदिन तो उन बच्चों का भी आता होगा जिनके पास पहनने के लिए कुछ नही। क्या उनके माँ-बाप को उस खुशी का हक़ नहीं जो हम महसूस करते है। मन अपने आप से सवाल पूछता, क्या मेरी बिटिया के पहले जन्मदिन की पोशाक किसी जरूरतमंद माँ-बाप को उनकी खुशियां दे सकती है?, जवाब “हाँ” में आता। हमारा क्या है हम तो हमारी यादों को पहले ही अपने दिलों के संदूकों में सहेज कर रख चुके हैं। पहले की तरह इस बार भी “गूंज” ही सहारा था।

“गूँज के साथ सफर तो बहुत लंबा था, इतना लंबा की याद ही नही की कब शुरू हुआ था। ये तो वो किस्से हैं जो याद रह गए। ना जाने कितनी और चीज़ें “गूंज” के माध्यम से जरूरतमंदों तक पहुँची हैं, चाहे वो कमीज हो या कोट, जीन्स हो या सूट सलवार, स्टेशनरी, दवाई या खिलौने। उम्मीद है कि ये सफर आगे भी यूँ ही चलता रहेगा।

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