मसूरी की ओर

यूँ तो शिमला, नैनीताल के अलावा केरल के मुन्नार ओर महाराष्ट्र के लवासा जैसे हिल स्टेशन्स घूम चुका था लेकिन कहीं ना कहीं मसूरी ना घूम पाने का मलाल मन में था। दिल्ली से मसूरी की दूरी कुछ ज्यादा नही, कुछ 300 किलोमीटर है इसलिए मन अपने आप को और ज्याद लानत देता रहता था। ज्यादातर लोग तो अपनी अपनी गाड़ियों से ही सप्ताहांत के दौरान मसूरी घूमने निकल पड़ते है। वैसे दिल्ली से ट्रेन से देहरादून पहुँचकर और वहा से बस या टैक्सी पकड़कर भी मसूरी पहुँचा जा सकता है, लेकिन आजकल हवाई यात्रा का चलन भी काफी चल चुका है।

जनवरी में जयपुर में लगने वाले प्रसिद्ध लिटरेचर फेस्टिवल में सपरिवार जाने का कार्यक्रम बनाया था। ऑनलाइन पासेज भी ले लिए थे और होटल की बुकिंग भी हो गयी थी, लेकिन किसी वजह से जा नही सके, तभी सोच लिया कि मार्च में तो कहीं ना कहीं जाना ही है। एक ऑनलाइन ट्रेवल पोर्टल देखते देखते अफोर्डेबल एयर टिकट भी मिल गए। मसूरी जाने के लिए देहरादून तक हवाई जहाज से जा सकते है लेकिन उसके बाद बस या टैक्सी ही सहारा है।

जाने से कुछ दिन पहले मसूरी के होटल में 2 दिन की बुकिंग भी करा दी।अब केवल टैक्सी की व्यवस्था करना बाकी था। जब भी कभी घूमने का कार्यक्रम बनता है तो अच्छा महसूस होता है लेकिन यात्रा के दौरान अपनी ओर परिवार की सुरक्षा भी उच्च प्राथमिकता होती है। विश्वशनीय टैक्सी के लिए मैंने होटेल में फ़ोन किया, होटेल के प्रतिनिधि ने मुझे टैक्सी स्टैंड से संपर्क करने को कहा, मैंने उसको बोला कि वो ही किसी विश्वसनीय टैक्सी वाले से बात कर उसे मुझसे बात करने के लिए बोले। दो ही मिनट हुए थे कि मेरा मोबाइल फोन बज उठा। सर राजू बोल रहा हो, दूसरे तरफ से टैक्सी ड्राइवर की आवाज़ कान में पड़ी। सर, होटल से फ़ोन आया था कि मसूरी के लिए टैक्सी चाहिए। मैंने कहा “हाँ”, क्या चार्जेज है, “दो हजार” उसने बोला। मैंने उसको बोला कि ठीक रेट बोलो, उसने कहा कि सर मैंने मिनिमम ही बताया है। मैंने हाँ कर दी, मैं भी केवल प्रयास करके ही देख रहा था कि शायद कम कर दे वार्ना रेट तो ठीक ही था।

17 मार्च 2018 की सुबह 11:30 बजे की फ्लाइट थी, टैक्सी पकड़कर एयरपोर्ट पहुँच गए। आजकल एयरपोर्ट का माहौल भी रेलवे स्टेशन जैसा जान पड़ता है, हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या जो बढ़ती जा रही है। इस बार मेरी सीट श्रीमती जी और बिटिया की सीट से अलग थी। एक सहयात्री से अनुरोध कर सीट की अदला बदली की और फिर निकल पड़े ड्रीम डेस्टिनेशन के हवाई सफर पर। लगभग आधे घण्टे में ही जहाज की देहरादून में लैंडिंग होने लगी, किसी पहाड़ी इलाके पर हवाई जहाज से जाने का ये मेरा पहला अनुभव था। देहरादून के उत्तराखंड के शुरुआती इलाके में ही होने के कारण वो एक रिज इलाके जैसा जान पड़ता है। ऊपर से देखने पर कहीं घनी हरियाली तो कहीं छितरे-छितरे लगे पेड़-पौधे देखकर मन हर्षित तो हो रहा था लेकिन लैंडिंग के वक्त हवाई जहाज के बार-बार हिचकोले खाने के कारण कलेजा मुँह को आ रहा था। यात्री किसी से कोई बात न कर सहमे हुए से बैठे थे, डर तो शायद सभी को लग रहा था। अंततः जहाज उतरा और जान में जान आयी।

एयरपोर्ट पहुँच कर पहले चेक इन लगेज लेना था। लगेज लेने ही लगा था कि फोन की घंटी बज गए। ड्राइवर का फ़ोन था वो अराइवल पर हमारा वेट कर रहा था। मैंने एक लंबे तगड़े छह फुट के आदमी को मेरे नाम की तख्ती पकड़े हुए देखा लेकिन देख कर भी अनदेखा कर दिया, ये चेक करने के लिए की वो तख्ती वाला आदमी और फोन करने वाला आदमी एक ही है या अलग अलग। मैंने फोन लगाया तो तख़्ती वाले आदमी ने फ़ोन उठाया, अपनी तसल्ली होने पर मैंने उसकी तरफ मोबाइल हिलाकर अपनी ओर आने के लिए ईशारा किया। “गाड़ी किधर है” उसकि ओर देखते हुए मैंने पूछा, यही सामने सड़क के उस तरफ ” समान उठा कर गाड़ी की ओर बढ़ते हुए उसने बोला। गाड़ी में बैठे ओर चल पड़े उस छोटे से पहाड़ी शहर मसूरी की ओर जिसे लोग “क्वीन ऑफ हिल्स” के नाम से जानते हैं।

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