रामोजी फिल्म् सिटी में बसा है संसार

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मैं आधी रात को दिल्‍ली से हैदराबाद हवाई अड्डे उतरा। यह सोलो ट्रैवलर के तौर पर मेरी पहली यायावरी थी। यहां पहुंचने के बाद अपने को पुराने हैदराबाद शहर में सस्‍ते होटल की तलाश करनी थी। इंटरनेट से जानकारी मिली थी कि नामपल्‍ली रेलवे स्‍टेशन के आसपास काफी सस्‍ते और अच्‍छे होटल मिल सकते हैं। यहां ऍप से एक होटल 800 रुपये प्रतिदिन पर बुक कर लिया था। नामपल्‍ली पहुंचाने को टैक्‍सी वाले के हजार रुपये मांगने पर एक स्‍थानीय सज्‍जन ने बताया कि सामने की ओर कई बसें खड़ी हैं, पूछकर बैठ जाइए। बस कंडेक्‍टर ने नामपल्‍ली रेलवे स्‍टेशन की जगह लकड़ी का पुल नाम की जगह तक ले चलने की बात कही। अच्छा लगा कि दक्षिण भारतीय राज्य के इस हिस्से में लोग हिंदी समझ और बोल पा रहे थे। सहयात्रियों ने बताया कि वहां से नामपल्‍ली करीब ही है। बस में करीब 20 किलोमीटर के 265 रुपये अधिक लगे, लेेेकिन उस समय यही सबसे सस्‍ता विकल्‍प था। लकड़ी का पुल पर उतरने के बाद पचास रुपये में होटल तक जाने को एक आटो में बैठ गया। चालक ने बातचीत के बाद कहा कि वह 500 रुपये में भी बेहतर कमरा दिला सकता है। कम दाम होने के चलते एक बार होटल रूम देख्नने का निर्णय ले लिया। नामपल्‍ली रेलवे स्‍टेशन के पास फेमस लॉज पर आटो रूका। सुनसान और छोटा सा लॉज देख कुछ हिचकिचाहट हुई, लेकिन यह सोचकर कि रात के ढाई बज रहे हैं, सुबह दूसरे में शिफ्ट हो जाएंगे, इसी में रहने का निर्णय लिया। होटल ठीक-ठाक था। सुबह वहां कई परिवारों को भी रूकते देखा तो मुझे माहौल अच्‍छा लगने लगा। उस लाॅज में अन्‍य होटलों की तरह सुबह या दोपहर को चेक इन या चेक आउट का समय न होकर कमरा लेने के 24 घंटे बाद चेकआउट का विकल्‍प था। अपने को यह अच्‍छा लगा।

45 रुपये में पहुंचा रामोजी 
सुबह उठकर रामोजी फिल्‍म सिटी कीे ओर कूच करने का निर्णय लिया। लॉज स्‍वामी ने बताया कि टूरिस्‍ट बस रामोजी आने-जाने के 500 और टैक्‍सी 2000 के आसपास लेगी। मैंने तीसरे विकल्‍प मेट्रो का चयन किया। जानकारी कर नामपल्‍ली मेट्रो स्‍टेशन से एलबी नगर का 40 रुपये का टिकट लिया। एलबी नगर मेट्रो स्‍टेशन पर उतरने पर कई ऑटो वाले 400 रुपये में रामोजी ले जाने की बात कर रहे थे। मैंने उनकी न सुनते हुई सड़क पर बस की प्रतीक्षा कर रहे लोगों से बात की। एक सज्‍जन के बताने पर लोकल बस में बैठ गया। मात्र 15 रुपये में इस बस ने मुझे रामोजी फिल्‍त सिटी उतार दिया।

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-रामोजी फिल्म् सिटी में बसा है संसार

रामोजी फिल्म् सिटी के प्रवेश द्वार से करीब 500 मीटर चलने के बाद टिकट खिड़की पर पहुंचा। यहां वयस्‍यक के लिए 1250 और बच्चे के लिए इससे 200 रुपये कम में टिकट मिल रही थी। टिकट लेकर अंदर प्रवेश किया। वहां से हमें बस में बैठाया गया। विशाल मैदानों और छोटे-छोटे पहाड़ों के कुछ किलोमीटर का चक्‍कर चलाने के बाद बस एक जगह रूकी। यहां से हमें बस बदलनी थी। यहां खुली बस मिली और हमें गाइड ने बताया गया कि आप अपनी मर्जी से कितने भी समय एक जगह रूकने के बाद किसी भी बस में बैठ अगले सैट तक पहुंच सकते हैं। गाइड रास्‍ते में दिख रहे पार्कों, बाजारों और भवनों के सैट के बारे में वहां हुई फिल्‍मों की शूटिग का हवाला देते हुए जानकारी दे रही थी।

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ऐसी खुली बसों से कराई जाती है फिल्म सिटी की सैर

पूर्ण पर्यटन स्थल है रामोजी
फिल्मी स्टूडियो का नाम आते ही विभिन्न प्रकार के सैटों के साथ-साथ “लाइट, साउंड, कैमरा, एक्श‍न” कहते निर्देशक व अभियन करते कलाकार याद आते हैं, लेकिन रामोजी फिल्म सिटी को देखकर लगा कि यह एक स्टूडियो होते हुए भी हटकर है। यह मात्र शूटिंग तक नहीं सिमटा है। पूर्ण पयर्टन स्थल है। खास बात है कि यह बच्चों , युवाओं और बुजुर्गों सभी को आकर्षित करता है। घूमते-घूमते कब सुबह से शाम हो जाती है, पता ही नहीं चलता।

-दिखे जापान और यूरोप के रंग
यहां यूरोपीय शैली के मकान, राजस्थानी स्थापत्य कला की झलक देते स्थायी सैट दिखाई देंगे। अन्य देशों और प्रदेशों की झलक देने वाले सैट देखे। शाहरूख खान की फिल्म “चेन्नई एक्प्रेस” में प्रयोग हुई ट्रेन आज भी यहां बने रेलवे स्टेशन पर खड़ी है। इसे कई अन्य् फिल्मों में भी दिखाया गया है। यहां ट्रेन के आगे खड़े होकर फोटो खिचाने की पर्यटकों में होड़ लगी थी।

सैटों में सबसे बड़ा आकर्षण मेगा हिट फिल्म बाहुबली का सैट लगा। यहां इस फिल्म से जुड़े महल, मंदिर, सिंहासन के साथ-साथ देव सेना को बंदी बना दिखाया जाने वाला पिंजरा भी दिखाई दिया। बहुत से लोग सैट के साथ पिंजरे में कैद होकर भी फोटो खिंचा रहे थे। हिंदी सहित अन्य भाषाओं में “बाहुबली” के संवाद गूंजते रहने से अलग ही अनुभव हो रहा था। फिल्म  के मुख्य‍ किरदारों वाले हूबहू से दिखने वाले पुतलों के साथ आप पर्यटक सेल्फी ले रहे थे।

 

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रामोजी में यूरोपीय शैली में बने भवन
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यह यूरोपीय शैली का फव्वारा कई फिल्मों में देखा होगा।
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बाहुबली फ़िल्म में फ़िल्म की पात्र देवसेना को इसी पिंजरे में रखा गया था।

 -भवन एक प्रयोग अनेक
रामोजी फिल्म् सिटी में एक ही भवन का प्रयोग कई प्रकार से होता देख बडा आश्चर्य हुआ। जैसे भवन के एक ओर से आपको चर्च दिखेगा तो दूसरी ओर यह अस्पताल की तरह बनाया गया है। तीसरी तरफ  कोर्ट और चौथी तरफ यह भव्‍य बंगले का द्वार नजर आएगा। सेंट्रल जेल के बराबर में ही सब जेल का द्वार था। हमारी देखी किसी फिल्म में दिखे ये भवन हो सकता है, यहां के एक ही भवन का हिस्सा हों।

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एक ओर सब जेल का द्वार, बराबर में ही है सेंट्रल जेल का गेट

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-बौद्ध और महाभारत काल की भी सैर   
रामोजी फिल्म सिटी में बनी गुफा में आपको भगवान बुद्ध की हजारों साल पुरानी प्रतीत होने वाली मूर्ति के साथ उनके दौर के अन्य दृश्य भी देखने को मिले। इन्हें देख ऐसा एक पल को भी नहीं लगा कि ये पिछले कुछ वर्षों में ही बनाई गई हैं। महाभारत काल की सैर कराने वाली गैलरी में उस दौर के दरबार और संवाद बोलते पात्रों के दर्शन से बडा आनंद मिला।

-विदेशी परिन्दों और तितलियों से हुई मुलाकात 
रामोजी फिल्म सिटी में सब कुछ कृत्रिम नहीं है। यहां विश्व के विभिन्न देशों में पाए जाने वाले पक्षी और खूबसूरत तितलियां देखने को मिलीं

हॉलीवुड जाने की जरूरत नहीं, रामोजी की एक पहाड़ी पर ही लिखा है HOLLYWOODWhatsApp Image 2019-03-30 at 13.54.40

अंतरिक्ष की सैर की , लिया झूलों का आनंद 
रामोजी फिल्म सिटी में अंतरिक्ष की सैर जैसा अनुभव करने का मौका भी मिला। यहां एक कक्ष में लगी जोरों से हिलती कुर्सियों पर बैठाकर पर्दे पर दिख रहे यान के साथ साउंड के अद्भुत मेल से खुद को अंतरिक्ष में पाया। दर्शकों को एक हाल में बैठाकर फिल्म निर्माण प्रक्रिया बड़े ही रोचक ढंग से समझाई गई। विभिन्‍न प्रकार के झूलों पर बच्चों के साथ हमनें भी आनंद लिया।

लाइव म्यूकजिक कंसर्ट में जमा देशभक्‍ति रंग   
रामोजी फिल्म् सिटी में शाम पांच बजे से आठ बजे तक गीत, संगीत और नृत्य के साथ कलाकार विभिन्न प्रस्तुति देते हैं। हम गणतंत्र दिवस को वहां थे तो हिंदी, पंजाबी और दक्षिण भारत के गीतों पर भारत माता की जय के जयघोष ने वातावरण को देशभक्‍तिमय कर दिया।

-कैसे पहुंचे
रामोजी फिल्म सिटी पहुंचने के लिए पहले हैदराबाद पहुंचे। हवाई और रेल मार्ग से हैदराबाद देश के सभी बड़े शहरों से जुड़ा है। आसपास के शहरों या राज्यों के लोग बसों से भी पहुंच सकते हैं। रामोजी घूमने को सुबह दस या ग्यारह बजे तक पहुंचना बेहतर रहता है। इससे आप पूरी तसल्‍ली से यहां मिलने खुली बस में बैठ इसका भरपूर आनंद ले सकते हैं।

 
टिप्पणी: लेख में व्यक्त किए गए विचारों एवं अनुभवों के लिए लेखक ही उत्तरदायी हैं। संस्थापक/संचालक का लेखक के विचारों या अनुभवों से सहमत होना अनिवार्य नहीं है।

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