सफ़र और मुस्कराहट!!!

श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी’ की उस बात को सच करते हुए हम भी फिजिक्स से मास्टर्स करने के बाद पीएचडी में इसलिए घुस पड़े थे क्योंकि हम भी अपनी यूनिवर्सिटी के उस राग से मशरूफ थे कि जो कुछ नहीं करते पीएचडी करते हैं। वर्ष २००० मैं श्रीनगर से एमएससी करने के बाद मैं दिल्ली जैसे शहर मैं कोई बहुत बड़े सपने लेकर नहीं आया था। लेकिन दिल्ली ने एक राह दिखाई जिसको पकड़कर अभी तक चलता जा रहा हूँ। बिना पलायन के दर्द पर कविताएं लिखे हुए क्योंकि मैं जानता हूँ अगर मैं पलायन नहीं करता तो शायद ये लिख भी नहीं रहा होता। अब आप ही सोचिये वर्ष २००० मैं किसी गाँव देहात से दिल्ली आये नमूने को एक ठीक ठाक से संस्थान में कोई फैलोशिप मिल जाए तो कैसे कदम जमीन पर रह सकते थे? तो पीएचडी मैं घुसने के बाद हम भी हवा मैं उड़ने लगे थे; हालांकि बाद मैं पता चला कि पीएचडी के परिंदे गाइड की मर्जी से उड़ते हैं 🙂 लेकिन कहीं न कहीं सोच पर एक तिलस्म जरूर जो आज भी गाँव और शहर के बीच वाली मानसिकता के मध्य झूलते लोगों का सत्य होता है। इसलिए मुझमें भी ‘मैं’ था और कहीं न कहीं मुझ पर हावी भी था। लेकिन ये भी सच है कि न कभी हमारे अंदर गाँव मरता है और न ही हम शहरी होकर ही जी पाते हैं। मैं बहुत ज्यादा सफर करता हूँ इसलिए सफर की छोटी बड़ी घटनाओं को अलफ़ाज़ देने की कोशिश भी करता हूँ। आज भी सफर पर हूँ तो फ्लाइट का इन्तजार करते करते एक छोटी सी भूली भटकी याद ने पलकों पर दस्तक दी और फिर मैंने उसको लिखना शुरू कर दिया। दिल्ली मैं पढ़ाई के दौरान सबसे बेहतर मौसम वो होता था जब कभी कबार घर जाने की परमिशन मिल जाती थी। सरोजनी नगर मार्केट से हाई फाइ ब्रांड्स की डुप्लीकेट जीन्स टी-शर्ट खरीदकर हम अपने आपको किसी स्टार से कम नहीं समझते थे 🙂 अमूमन रात का सफर होता था ताकि सुबह सुबह श्रीनगर और शाम तक घर पहुँच सकें। ऐसा ही मौक़ा एक बाद दिसंबर के महीने मैं आया था जब घर जाने का अवसर अनायास ही हाथ लग गया था। रात को दस बजे मैं भी दिल्ली की ब्लू लाइंस बसों के धक्कों के बीच ISBT पहुँच गया था घर जाने के लिए। और सच मानिये जब भी आप दिल्ली से बाहर जाते हैं कितना मनहूस सा लगता है दिल्ली ,,,,

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उम्र के उस दौर के सपने भी अजीब से होते थे जिसमें ध्यानाकर्षण के साथ साथ खूबसूरत हमसफ़र की तमन्ना होती थी जो दरअसल आज तक नहीं मिली। लेकिन उत्तर प्रदेश परिवहन की सरकारी बसों मैं हम हमेशा दो सीट वाली तरफ इसीलिए बैठते रहे कि क्या पता बगल की सीट पर कोई सुन्दर कन्या फ़िल्मी तरीके से आ जाए और सफर यादगार बन जाए 🙂 याद है आपको पोंड्स क्रीम का पुराने जमाने का वो विज्ञापन ,,,,, खूबसूरत लड़की प्लेन मैं आई। क्या मेरी किस्मत जागेगी ? और फिर लड़की उसीके पास आकर कहती है ,,,,एक्स क्यूज मी ,,,,, शायद आप मेरी सीट पर हैं। जिसका साफ़ साफ़ मतलब होता था कि खूबसूरती के लिए खूबसूरत होना जरूरी है क्रीम नहीं 🙂 यकीन मानिये उस जमाने में बस हो या ट्रेन या गाँव जा रही सूमो हम हमेशा इसी विज्ञापन के वशीभूत होकर यात्रा करते थे। कि अभी दरवाजा खुलेगा और एक सुन्दर सी कन्या हमारे पास में बैठेगी और तब जाकर कहीं गाड़ी चलेगी। फिर तो आपकी हिम्मत भले ही घंटों के उस सफर में लड़की को देखने और बात करने की न हुई हो लेकिन दोस्तों के पास फट्टे मारने का सॉलिड मसाला तैयार होता था। मुझे पता है इस संस्मरण को पढ़ने वाले भी कहीं न कहीं कभी इस मानसिकता का शिकार होंगे 🙂 लेकिन चलिए मैं आपके जज्बातों को शब्द दे देता हूँ। कुछ इसी तरह के खयालातों के साथ मैं भी ISBT पर ऋषिकेश की बस लेने के लिए पहुँच गया। जब हम स्टूडेंट थे तो हमारे सीनियर और बड़े भाई लोग इसी ISBT के नाम से हमको डराते थे की ज्यादातर लोग यहीं पर खोते हैं; खासकर पहाड़ी लोग। मैं भी दो सीट वाली तरफ बैठा था खिड़की की ओर और दिमाग मैं यही चल रहा था कहीं कोई कम्बक्त आदमी इस पर न बैठ जाए जिसको झेलना मुश्किल हो। जहाँ रात ने साढ़े दस बजाये तो दिल मायूस होने लगा ड्राइवर ने भी बस स्टार्ट कर दी थी। सर्दियों में कोहरे और ठण्ड की वजह से वैसे भी कम ही लोग रात का सफर करते थे। मैं दस रुपये मैं मिलने वाली चार पुरानी पत्रिकायें खरीदकर एक के पेज पलटने मैं मशगूल हो गया।
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जैसे ही बस चलने लगी अचानक दो तीन लोग बस में चढ़ने लगे। दो पुरुष थे और उनके साथ एक महिला थी। उनमें से एक बन्दा कंडक्टर से बात कर रहा था और दूसरा बन्दा महिला को अंदर लाकर उसका एक झोला कहीं एडजस्ट करने की कोशिश कर रहा था। महिला ठेठ पहाड़ी लग रही थी जिसका अंदाजा उसके खड़े होने मैं उसकी सकुचाहट से ही पता चल रहा था। गाड़ी मैं बहुत खाली सीटें थीं। अचानक महिला के साथ आ रहे एक आदमी ने पूछा क्या आपमें से कोई श्रीनगर तक जा रहा है ? किसी का कोई जवाब नहीं ,,,,, थोड़ी देर ख़ामोशी रही ,,,,, जैसे ही मैं कहने को हुवा तब तक कंडक्टर बोल पड़ा कि हम ऋषिकेश तक ही जाएंगे। डायरेक्ट श्रीनगर वाली बस आठ बजे निकल गयी। मेरी निगाहें उस महिला से टकराईं जिनमें दिल्ली की हवाओं से जुड़ा परायापन मैं पहचान सकता था।,,,, अचानक उस महिला ने ही मुझसे पूछ लिया ठेठ गढ़वाली में ,,,,तुमुन कख तक जाण ?? अब मैं क्या बोलूं ? झूठ नहीं बोल पाया। मैंने कहा रुद्रप्रयाग। उसने तसल्ली की सांस ली और अपने साथ आये बन्दे को आवाज दी कि इस नमूने को श्रीनगर से आगे जाना है :)दोनों बन्दे मेरे पास आकर खड़े हो गए। अगर आप हमारी बहिन को कीर्तिनगर पल पर उतार दें तो आपकी बहुत मेहरबानी होगी। गाँव में कोई अर्जेंट काम पड़ गया इसलिए इसको अकेला रात को ही रवाना कर रहे हैं। वैसे तो ये रात का सफर कर लेगी लेकिन बस आप साथ मैं रहेंगे तो तसल्ली रहेगी। बाकी तो कोई दिक्कत नहीं बस ऋषिकेश मैं बस बदलने में इसको थोड़ी दिक्कत होगी तो आप मदद कीजियेगा.,,,और मैंने फिर एक अनमनी सी हाँ भर दी, दोनों ने हिंदी और अंगरेजी मैं पूरे शहरी तरीके से मेरा धन्यवाद अदा किया।

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कश्मीरी गेट बस अड्डे पर सर्दी की किसी रात मैं कोई महिला अपने रिश्तेदारों से भरी गाड़ी मैं लिपटकर रोये ,,,, आज से पंद्रह साल पहले भी अजीबोगरीब ही लगता था। दीन दुनिया से बेखबर वो महिला अपने आये दोनों लोगों जो शायद उसके भाई या नजदीकी रिश्तेदार रहे होंगे उनसे लिपटकर ऐसे रोने लगी जैसे किसी गाँव की गेट की गाड़ी तक पहुँचते हुए किसी जमाने में धियाणियां रोती थीं। और शायद इन्हीं गतिविधियों से आगे पीछे बैठे लोग उस महिला और उससे सम्बद्ध लोगों के गंवार होने का सही सही अंदाजा लगा रहे थे। मेरे लिए सिचुएशन कठिन हो रही थी। बस चलने लगी तो महिला के रोने की आवाज भी तेज हुई लेकिन फिर दोनों बन्दे जल्दी जल्दी उत्तर गए। पहले बन्दे ने गाड़ी का टिकट लिया और दुसरे बन्दे ने उसके हाथ में एक पाँच सौ का नोट ठूंस दिया। भाई साहब जो भी होगी आपको लेकिन इनको सही सलामत वहां उतार दीजियेगा।
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एक लड़की या फिर महिला की अनचाही आकस्मिक मुस्कान से भी पुरुष मन सेकेण्ड के लाखवें भाग मैं भी कितनी सारी गणनायें कर लेता है। हाव, भाव, चाल, चेहरा, चरित्र और सम्भावनायें, सब कुछ। इतने कम वक़्त मैं कदाचित पुरुष मन खुद को समझने को तत्पर नहीं होता जितने कम वक़्त में वो स्त्री को लेकर धारणा धर लेता है। मैं भी पुरूष मन की इसी परम्परा का वाहक था :),,, एक महिला को बहुत सारे प्रकृति प्रदत्त गुण होते हैं जिनमें एक यह भी है कि एक स्पर्श मात्र से महिला किसी व्यक्ति की मानसिकता भांप सकती है। मेरे पास वाली सीट मैं जैसे वो महिला बैठी तो मैंने अपने आपको सिकोड़कर एक तरफ कर लिया। दुनिया जहां का क्या कहना, ज़माना खराब है, कुछ भी सही गलत हुवा तो लोगों ने मुझी को कूटना है आदि आदि नए नए इन्टरनेट से पढ़े हुवे विचार दिमाग मैं घूम रहे थे। दिल्ली छूटा , शाहदरा और गाजियाबाद तक वो महिला सिसकती ही रही ,,,,, मेरे लिए बहुत मुश्किल था एडजस्ट करना। वैसे भी सुहाने सपनों की वाट लग चुकी थी। लेकिन ये महिला टफ सीन बंद करने को राजी ही नहीं थी। मेरी खिड़की वाली सीट हथिया चुकी थी ,,,, मेरी बोतल का पानी भी सुट्ट कर लिया था

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मेरठ पहुंचकर कहीं वो महिला शांत हुई। सोना तो सम्भव था नहीं , इसलिए जैसे ही थोड़ी रौशनी मिलती मैं पत्रिका पलटने लगता। अचानक मैंने नोटिस किया जैसे ही मैं पत्रिका पलट रहा हूँ वो हंस रही है ,,,, और फिर उसने मुझसे टाइम पूछा तो तक कहीं जाकर मुझे उसकी आवाज सुनाई दी। खालिश गढ़वाली में बोली। मैं पहली बार दिल्ली आई थी लेकिन मुझे यहाँ बिलकुल अच्छा नहीं लगा। यहाँ के लोग अच्छे नहीं हैं। इस बात से बेपरवाह वो कहे जा रही थी कि बस मैं उसकी बात सुन रहे तमाम लोग दिल्ली मैं ही रहते हैं। फिर अपनी ही बातों पर वो अनायास हंसने लगती। थोड़ा और वक़्त गुजरने पर ही मुझे पुख्ता यकीन हो गया था कि वो दरअसल एक मंदबुद्धि (लाटी) महिला है,,,,,, लेकिन शायद निर्लिप्त और निरभ्र ,,,, मुझे ‘तू’ कहकर संबोधित करने मैं उसने ज्यादा वक़्त नहीं लिया। उसकी उम्र शायद पैंतीस चालीश साल के बीच ही रही होगी। बेतरतीब पहनावा था , सामान्य सा चेहरा था लेकिन कुछ न कुछ ऐसा तो था उसमें जो उसको कुछ अलग सा बना रहा था उस माहौल में ,,,,, उसकी आधी बातें ही मैं सुन पा रहा था और आधी उसकी बेपरवाह हंसी में खो रही थीं इस बात से भी बेखबर कि गाड़ी मैं बहुत लोग उसकी बातों से सो नहीं पा रहे हैं। बातें भी कैसी ,,,, कि पहली बार मैंने रेल यहीं देखी ,,,,, हवाई जहाज मैं भी आदमी ही होते हैं क्या ? इन सारे लोग दिल्ली मैं कहाँ आते जाते रहते हैं ,,,, यहाँ कोई सड़क पर मर गया तो उसके घरवालों को कैसे पता चलेगा,,,, यहाँ के मकान इतने ऊँचे कैसे ,,,,,उफ्फ्फ्फ़ ,,,,, कभी न ख़त्म होने वाले कौतूहल पूर्ण सवाल जिनका मेरे पास हाँ और ना मैं भी जवाब नहीं था। उसी की बातें सवाल थीं और जवाब भी। मैं सोच रहा था कब बस रुके और मैं बाहर उतरूं ,,,, या फिर ये सो जाए ,,,, बस इससे ज्यादा कुछ नहीं ,,,,, रूड़की तक मैं उससे उसकी दुनिया की बहुत सारी बातें सुन चुका था। उसको चुप कराना सम्भव भी नहीं था क्यों एक दो बार कोशिश की भी तो पांच मिनट बाद फिर शुरू। बातें, बातें और बेतरतीब हंसी ,,,,, लेकिन ये भी सच था कि उसकी हंसी अलग जरूर थी। ,,,,शायद मौकों और सलीकों की पाबंद नहीं थी

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एक अकेली महिला के लिए आज से पंद्रह साल पहले दिल्ली से ऋषिकेश का रात का सफर करना शायद उतना मुश्किल नहीं होता होगा जितना रात में ऋषिकेश मैं बस से उतरते हुए ऑटो वालों से पीछा छुड़ाना होता होगा। मैं सोचता हूँ उत्तराखण्ड बनने के बाद एक अच्छा काम जरूर हुवा कि बस अड्डा कॉमन हो गया। शायद टिहरी वाले लोग अभी भी इसी त्रासदी (ऑटो वाले) से गुजरते होंगे। दुनिया के तमाम देश और शहर घूमने के बाद ऋषिकेश की गालियां आज भी मेरी समझ से बाहर हैं। मन में ख़याल आया कि अपना सामान उतार लूँ और अकेला आगे निकल पडूँ कोई अच्छी सी बस में खिड़की वाली सीट देखकर ,,,,,क्या पता यहीं किस्मत चमक जाए 🙂 । वो अभी तक सो रही थी ,,,,

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और फिर मैंने वही किया ,,,, मैंने धीरे से उठकर अपना बैग उतार लिया। सोचा जैसे ही बस अड्डे पर बस रुकेगी तो मैं कूदकर भाग जाऊंगा। यहाँ तक तो ठीक था आगे कौन मुसीबत उठाये ? ,,,,और फिर बस अड्डा आ गया ,,,,, शिकार पर एकदम से भूखे कुत्तों की तरह ऑटोवाले टूट पड़े,,,, बाहर से ही मोलभाव ,,,,,,लाल जैकेट वाली सवारी मेरी ,,,,,मफलर वाली सवारी मेरी ,,,, और मैं उतर पड़ा,,,,, बिना पीछे देखे किसी की परवाह किये बिना ,,,,, और मैंने फिर उसकी तरफ देखा भी नहीं ।

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दिल्ली से आने वाली बसें अमूमन चार पांच बजे सुबह ही ऋषिकेश पहुँचती थीं तो इसलिए इस वक़्त वहां पर अफरा तफरी का जैसा माहौल रहता है। उस वक़्त दिल्ली बस अड्डे से टिहरी बस अड्डे जहाँ से मुझे श्रीनगर की बस लेनी थी वहां तक के दस रुपये ऑटो को देने पड़ते थे। दस रुपये मेरे लिए उस वक़्त काफी मायने भी रखते थे। उस पर अगर उस महिला का किराया भी मुझे देना पड़ता हो ,,,,,, नहीं नहीं ,,,,, मैं ही भला क्यों करूँ ?? यहाँ तक तो भला किया ही है न ,,,,छोड़ो ,,,,,, पास ही ऑटोवाला लास्ट सवारी लास्ट सवारी चिल्ला रहा था। मैं उसके साथ की उसकी सीट पर आगे शिफ्ट हो गया। ठण्ड इतनी ज्यादा थी कि पूरे शरीर में जकडन महसूस हो रही थी।

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ऑटो वाला चल पड़ा। तेजी से कानों को चीरती हुई ठंडी हवा ,,,, एक किलोमीटर से ज्यादा आगे आ चुका था ,,,, और फिर मन मैं सवालों का ज्वार ,,,, मन ने धिक्कारना शुरू किया ,,,,, शायद देवभूमि में पहुँच जाने की आहट थी। मैं ये क्या सोच रहा हूँ ?? मेरा कोई स्वत्व है भी या नहीं ?? तू कैसा पढ़ा लिखा इंसान है जो एक मानवीय जिम्मेदारी से भाग रहा है ? अपनी सोच पर एक पल के लिए मैं लज्जित हो उठा ,,,,, मुझे महसूस हुवा जैसे मैं उतरा नहीं हूँ ,,,,, गिरा हूँ,,,, किसी नज़र से , किसी सोच से , खुद से। पता नहीं चेतना ने कहाँ से इतनी हिम्मत समेटी कि मैंने ऑटोवाले को रुकने को कहा। उसने पूरा किराया माँगा तो मैंने बिना कोई उत्तर दिए उसको पैसे दे दिए। वहां से वापस जो बेतहासा मैंने बस अड्डे की तरफ दौड़ लगाईं कि मैं खुद एक बार एक गाड़ी से टकरा भी गया। ड्राइवर की गालियों की परवाह किये बिना बहुत सारी उन बसों में मैं उस बस को खोजने लगा जिसमें दिल्ली से यहाँ तक आया था। मन यथासम्भव अनिष्ठ सोच रहा था और चेतना महत्तम सीमा तक धिक्कार रही थी। शायद स्वत्व शेष था जो मुझे भगा रहा था। कहीं वो किसी गाड़ी के नीचे आ गयी होगी ? कहीं किसी ने उसको भगा लिया होगा ? उसके साथ कोई क्या कर सकता है ? एक सांस मैं न जाने कितने ईश्वरों को याद कर रहा था मैं कि काश ,,,,वो मिल जाए

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लेकिन वो कहीं नहीं दिखी, न ही बस दिखी। किसी कंडक्टर से पूछा तो उसने बस का नंबर बताने को कहा। टिकट से बस का पता चला कि बस डिपो में जा चुकी है। अन्धेरा था लेकिन पूरी सामर्थ्य से डिपो की तरफ भागा। और एक स्ट्रीट लाइट के पास खड़ी बस दिख भी गयी। गेट पर काफी लोग, और ऑटो वाले खड़े थे।,,,,, मैं सिहर गया ,,,,कि क्या हुवा होगा !!! लोगों के घेरे से अपने लिए रास्ता बनाकर देखा तो वो अपना झोला उठाये बस की सीढ़ियों पर बैठी हुई थी। हरयाणवी खड़ी बोली में ड्राइवर कंडक्टर उसको लगातार उतरने को कह रहे थे और ऑटो वाले दस रुपये सवारी लालच मैं घेरा जमाये बैठे थे। उड़ती उड़ती आवाज कानों मैं पडी कि अपने भाई के साथ आई है लेकिन भाई शायद पहले उतर गया और ये यहीं छूट गयी है। और फिर मेरी नजर उसके निस्तेज पड़ चुके चेहरे पर पड़ी और मैंने जैसे ईश्वर के आगे आत्मसमर्पण सा कर लिया।

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जब तक मेरा भुला (छोटा भाई) नहीं आएगा मैं कहीं नहीं जाउंगी ,,,, ये उसके अंतिम शब्द थे जो लोगों ने सुने थे। उसके बाद वो खामोश ही थी। शांत , भयाक्रांत और शायद मायूस। और फिर मैं अपना बैग वहीँ पर छोड़कर आगे बढ़ा और उसके हाथों को पकड़ लिया जो सर्दी में एक तरह से सुन्न हो गए थे। उसने जिस भाव और अधीरता से मेरी तरफ देखा मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता। उठकर एकदम से मुझसे लिपट गयी और हारे हुए भावों में रोना शुरू कर दिया। मैं शून्य था क्योंकि मेरे पास कुछ कहने को था नहीं और वो शिकायत कर रही थी कि मैंने उसको ऐसे कैसे छोड़ दिया। शायद मेरी आंखें भी सजल हो उठतीं लेकिन मैं कुछ कहता इससे पहले भीड़ ने ताने देना शुरू कर दिया , गैर जिम्मेदार , बेवकूफ आदि आदि। लेकिन जीवन मैं शायद पहली बार कोई आलोचना परेशान नहीं कर रही थी। अपना बैग पीठ पर लटकाकर एक हाथ से उसका झोला उठाये और दुसरे हाथ से उसको सहारा देते हुए उसको बाहर लाने लगा। पीछे से लोगों की आवाजें कान मैं पड़ रही थी ,,,,,कहाँ कहाँ से आ जाते हैं साले पहाड़ी नमूने ,,,,,,,तीसरी दुनिया के लोग ,,,,,,आदि आदि।

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मैंने फिर एक ऑटो वाले को हाथ दिया। उसको बिठाया , सामान चढ़ाया और टिहरी बस अड्डे की तरफ चल दिया। उतारते वक़्त जब मैं किराया दे रहा था तो बोल पडी तू मेरा किराया भी देदे मैं तुझे आगे पैसे दे दूंगी। मैं हंस पड़ा ,,,,,और इस वक़्त कहीं भी मेरे दिमाग मैं रुपये पैसे का हिसाब नहीं आया। कीर्तिनगर तक के तकरीबन कुल सत्तर रुपये किराए के लगते थे । बस मैं सवारियां बैठ रहीं थी। मैंने उसको अंदर बिठा दिया और बाहर कंडक्टर से दो टिकट खरीद ली लेकिन एक बार भी एक पल के लिए भी मेरे मन में पैसों का ख़याल नहीं आया। खुद ने खुद पर जीत सी पा ली थी और महसूस हो रहा था जैसे मैं एक गहरी खाई मैं गिरने से बच गया हूँ। अपनी साँसों की तेज गति मैं अब भी महसूस कर पा रहा था। बस के चलने मैं अभी वक़्त था और बहुत ज्यादा ठण्ड हो रही थी। पास मैं एक ठेलेवाला स्टोव पर चाय बना रहा था तो मैं चाय पीने चला गया। तब तक वो भी बस से उतरकर बाहर आ गयी ,,,,, अब फिर से कहीं मत चले जाना ,,,,,,मुझे भौत डर लग रहा है। एक चाय उसके लिए भी बनवाई और अब वो कुछ सामान्य सी थी। बल्कि मैं भी सामान्य हो रहा था। ,,, इस वक़्त वो अपने आपको सबसे सुरक्षित महसूस कर सकती थी और कर रही थी।

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और फिर बस चल पडी। खिड़की की तरफ वो बैठी थी। बर्फीली सी हवा महसूस हो रही थी। गंगा नदी के समानान्तर धीरे धीरे हम ऊंचाई की और बढ़ रहे थे। व्यासी से आगे आने पर सूर्योदय के आसार भी दिखने लगे। गुलाबी से आसमान की सुनहरी किरणों ने सबेरा कर दिया था। भारी होती उंघती आँखों में उसके चेहरे पर पड़ती सुनहरी धूप उसको उस वक़्त का सबसे खूबसूरत किरदार बना रही थी। मोड़ों पर इधर उधर हिलने डुलने की वजह से अब सो पाना सम्भव नहीं था। जैसे जैसे ऊंचाई बढ़ रही थी सोच का दायरा भी विस्तृत हो रहा था। अब मुझे उसका मेरे कंधे पर सर रखकर तसल्ली से सोना अखर नहीं रहा था और न ही मेरे मन में कोई असुरक्षा की भावना शेष थी। पहाड़ के भूगोल से सम्बद्ध सिर्फ ऊंचाई और गहराई ही नहीं होती एक प्रगाढ़ दर्शन भी होता है जो शुद्ध वैचारिक होता है , मुक्त चिंतन होता है जो मैं महसूस कर पा रहा था।

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थोड़ी थोड़ी बातें शुरू कीं। उसकी आवाज इतनी गहरी थी कि मैं सोचने लगा कि अगर वो गायिका होती तो कितनी सुरीली होती। एक अजीब सा खालीपन था उसके चेहरे पर और बातों मैं अजीब सी उदासी। पता नहीं वो घर आने से खुश थी या नहीं लेकिन कहीं न कहीं कुछ न कुछ ऐसा था जो उसके वास्तविक और तत्कालीन वजूद में अंतर कर रहा था। मैंने उससे कहा भी ,,,,, तुम वो नहीं हो जो मेरे साथ है ,,,,, लेकिन उसके फिर उसी लाटी वाली हंसी मैं बात गुमा दी और कहा,,,,लेकिन मैं जानती हूँ तुम वही हो जो मेरे सामने मेरे साथ है,,,,, अपनी प्रकृति मत खोना और हमेशा ऐसे ही रहना । बहुत रहस्यमय शब्द थे जो आज तक शायद मेरे समझ नहीं आये।

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देव् प्रयाग से आगे आने के बाद उसकी चहक थोड़ी थोड़ी गंभीरता में बदलने लगी। न मैंने उससे उसके घर परिवार के बारे मैं पूछा न ही उसने मुझसे। बस एक सफर था जो एक महानगर से शुरू हुवा था और कुछ उतार चढ़ावों के बाद पहाड़ी के एक मुहाने पर पूरा होने की कगार पर था। उसको अंदेशा था कि मैं एक विद्यार्थी हूँ लेकिन क्या पढता हूँ ये नहीं समझ पायी थी। किसी वक़्त मुझे लगता वो शायद बहुत कुछ कहना चाहती है लेकिन अगले ही पल एक खनकती हुई लाटी हंसी सब बदलकर रख देती थी।

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और फिर कीर्तिनगर का पुल भी आ ही गया। सर्दियों का घना कोहरा और श्रीनगर की ठण्ड ,,,,, ड्राइवर ने गाड़ी साइड मैं लगा दी और पांच दस मिनट रुकने का इशारा कर दिया। लोकल सवारियां भी भरनी थीं। मैंने उसका झोला उठाया और उसको बाहर आने को कहा। एक भारी मन से बोझिल से क़दमों के साथ वो गाड़ी से उतर गयीं। मैंने उसके हाथों मैं उसका झोला थमाया और उसने मेरे हाथ पकड़ लिए। बहुत परेशान किया मैंने तुझे ,,,,, भगवान् तुझे खुश रखे ,,,,, अपना ख़याल रखना ,,,,बहुत भले घर का लड़का है तू ,,,, मैं सिर्फ उसकी बातें निर्लिप्त मन से सुन रहा था और ये भी महसूस कर रहा था कि निर्लिप्त होना कितनी सहज मनोदशा होती है। मैं एक तसल्ली के साथ पुल पर उसके साथ खड़ा था। और अंतिम पांच मिनट भी गुजर गए। ,,,,, तेरा बहुत खर्चा हो गया ,,,,,, ले रास्ते में एक चाय पी लेना ,,,, मैं तुझे क्या दे सकती हूँ ,,,,,, और उसने अपने झोले मैं हाथ डालकर मेरे कुर्ते की जेब में कुछ डाल दिया। बिलकुल वैसे जैसे बचपन मैं मेरे कोई रिश्तेदार या बड़े बुजुर्ग कभी हमको पैसे दक्षिणा के तौर पर देते थे। और फिर बस चल दी ,,,, उसकी आंखें सजल थीं ,,,,लेकिन एक दिव्य सी मुस्कान उसके चेहरे पर थी। कोहरे मैं धरी धीरे उसकी तस्वीर धुंधली सी होने लगी और फिर वो गायब भी हो गयी। लेकिन मैं समझ सकता था की वो तब तक वहां से नहीं हटेगी जब तक उसको दूर दूर तक गाड़ी का दिखना बंद न हो जाय। बिल्कुल वैसे जैसे पहाड़ों में लोग जब अपनों को छोड़ने सड़क तक आते हैं और नज़रों की अंतिम सीमा तक गाड़ी को देखते रहते हैं

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और फिर श्रीयंत्र टापू के दर्शन , भक्तियाना , कमलेश्वर और पिक्चर हॉल के बाद श्रीनगर का बस स्टैंड। वो शहर जहाँ हमने जिंदगी का सबसे बेहतरीन वक़्त जिया। यहाँ से गए मुझे अभी डेढ़ साल ही हुवा था। एक दोस्त मुझे स्टैंड पर लेने भी आया था। फेमस कंडारी टी स्टाल की चाय और कम समय मैं की जाने वाली बहुत सारी बातों के दरमियान वो चेहरा अभी भी नजरों के सामने आ रहा था। मैं अमूमन श्रीनगर मैं एक दिन रुकता जरूर था लेकिन इस बार पता नहीं क्यों मन नहीं हुवा। रुद्रप्रयाग की बस पकड़ ली। धारी देवी मंदिर के आस पास कहीं थोड़ी धूप दिखने लगी। सड़क से नीचे नदी की तरफ देखते ही हाथ अनायास जुड़ जाते हैं। आज पुराने मंदिर को हाइड्रो प्रोजेक्ट की झील डुबो चुकी है लेकिन आस्था उसी रूप में संरक्षित है।

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मंदिर के द्वार के सामने से गुजरते हुए एक बार अनायास रात की पूरे घटना आँखों के सामने से गुजर गयी। और फिर याद आया कि कीर्तिनगर पुल पर उसने में जेब में कुछ ठूंसा था। कहीं किराए के पैसे सच्ची मैं तो वापस नहीं किये थे ? मैंने जेब में हाथ डाला तो सच में एक बेतरतीब मुड़ा तुड़ा नोट ही है। बाहर निकाला तो मैं सन्न सा रह गया। पांच सौ रुपये का नोट था ,,,,, और अगर मैं गलत नहीं था तो ये वही नोट था जो दिल्ली ISBT पर बस में बैठते हुए उसके बड़े भाई या रिश्तेदार जो भी हो ने उसको दिया था ,,,,,,,और अब ,,,,, मैं और भी शून्य था ,,,, नोट की छुवन की उसके हाथों की तरह ही कुछ खुरदरी सी थी लेकिन इस खुरदरेपन ने आत्मा तक को पनीला कर दिया था। अब कहीं जाकर मेरी आंखें भी नम ही रही थीं। मैं दुखी था और ये बात महसूस कर संतुष्ट भी था कि अभी चेतना में दुःख महसूसने की संजीदगी मौजूद है। शायद इस छोटी सी लड़ाई में यही मेरी जीत थी कि मैंने खुद को खोया नहीं था । काफी देर तक संज्ञाशून्य सा मैं उस नोट को उलटता पलटता रहा और तब तक पलटता रहा जब तक मन पर भौतिकता न हावी हो गयी। रुद्रप्रयाग आते ही मैंने उस नोट को भी बटुवे के अन्य नोटों के साथ मिला लिया और फिर इस विषय पर न सोचते हुए अपनी राह के लिए निकल पड़ा।
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ये संस्मरण मैंने कोलम्बो एयरपोर्ट पर लिखना शुरू किया जब मैं दिल्ली वापस आ रहा था। ये एक ऐसा सच था जिसको जिस तरीके से मैंने जिया वही लिखने की ईमानदार कोशिश की है। एक बार सोचा इसको एक कहानी की तरह लिखूँ। उस महिला का कोई सुन्दर सा नाम दूं। लेकिन फिर सोचा क्या मैं अपने लिए भी कोई नाम दूंगा ? जब मैंने इस संस्मरण को ‘मैं’ के साथ लिख सकता हूँ तो चलो इस किरदार को भी ‘उसके’ संबोधन से ही लिखा जाय। और फिर एक सृजन में शायद जज्बात और जुड़ाव सबसे ज्यादा जरूरी हैं। घटना भले पंद्रह साल पुरानी हो लेकिन जब भी कीर्तिनगर के पुल से आना जाना होता है मैं आज भी वो चेहरा खोजने लगता हूँ। ,,,,,,, लेकिन ,,,, फैज साहब का यही कलाम कानों मैं गूंजता है ,,,,,
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तुम नाहक टुकड़े चुनचुनकर , दामन मैं छिपाये बैठे हो

सीसों का मसीहा कोई नहीं , क्यों आस लगाए बैठे हो

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डॉ ईशान पुरोहित

 

टिप्पणी: लेख में व्यक्त किए गए विचारों एवं अनुभवों के लिए लेखक ही उत्तरदायी हैं। संस्थापक/संचालक का लेखक के विचारों या अनुभवों से सहमत होना अनिवार्य नहीं है।

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