पहली विदेश यात्रा में – वालन ज़ी एटवास ऐसेन?

“पहली बार मैने हिन्दी में इतना कुछ पढ़ा, जो कुछ हुआ था आपने सब कुछ लिखा”, पीछे से आती आवाज पर मैंने मुड़ कर देखा तो मेरे एक मित्र मेरे पिछले यात्रा वृत्तांत की तारीफ कर रहे थे। मेरे ये मित्र गुजरात से हैं इसालिए पढ़ने की उनकी आदत भाषा के आधार पर अंग्रेजी या गुजराती तक ही सीमित रहती है। पिछले यात्रा वृत्तांत में जिस यात्रा का वर्णन था उस यात्रा में वे भी मेरे साथ थे शायद इसीलिए हिन्दी के उस लेख ने उन्हें उसे पूरा पढ़ने के लिए प्रेरित किया था।

भारत जैसे बड़े देश मे जहां 22 मुख्य भाषाएँ हैं, हिन्दी के साथ साथ unfortunately अंग्रेजी ऐसी दूसरी भाषा है जो इस देश को जोड़ती है। कालांतर में अंग्रेजी का प्रयोग बढ़ा है फलस्वरूप हिन्दी की उपेक्षा हुई है। इन्हीं कारणों से भारत में “भाषा” बहस का मुख्य विषय होती है। ऐसी बहस में अक्सर यह मत उभर कर आता है कि अंग्रेजी की जानकारी आपको और उन्मुख बनाती है। दूसरा पहलू यह है कि मात्र हिन्दी जानने वाले को पिछड़ा और अंग्रेजी जानने वाले को समझदार मान लिया जाता है।

यात्रावृत के इस लेख में “भाषा” का उल्लेख इस लिए है क्योंकि किसी यात्रा पर आप जैसे ही एक नए क्षेत्र में पहुंचते हैं, वहां के खान-पान, रहन-सहन से भी पहले आप रुबरू होते हैं वहां की भाषा से। अपने अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि जिन लोगों ने दूर दराज़ के क्षेत्रों और देशों की यात्रा की है वे इम बात से सहमत होंगे कि कुछ घटनाएं अक्सर हमें इस गलतफहमी से छुटकारा दिलाती हैं कि “अंग्रेजी जानना जरूरी है”।

खैर बात करते हैं पहली विदेश यात्रा की यानी, मेरी पहली विदेश यात्रा की। हम वियना एयरपोर्ट पर थे, हम यानि हम आठ इंजीनियर्स, जो एक ट्रेनिंग के लिए दो सप्ताह के लिए ऑस्ट्रिया आए थे।

हमें लेओबिन में एक सप्ताह और लिन्ज़ में एक सप्ताह बिताना था। सन 2003 के नवम्बर माह का अंतिम रविवार, सुबह का समय, भारत के स्तर से ठंड काफी थी और हमारे मेजबान जो एक छोटी वैन में हमें लेने आए थे ने हमें बताया कि लेओबिन वियना से लगभग 170 किमी दूर है और हमें वहां पहुंचने में लगभग 2 घंटे लगेंगे। तो हम चल पड़े। रात भर की उड़ान के बाद इन दो घंटों में आमतौर पर हम सब की आंखें बंद थीं और लगभग 11:00 बजे हम लेओबिन में अपने होटल के सामने थे। ट्रेनिंग सोमवार से शुरु होनी थी पर मेजबान ने हमें शाम को भोजन पर आमंत्रित किया था इसलिए शाम को मिलने का समय बता कर उन्होंने हमसे विदा ली। हमने भी अपने कमरों में जा कर नहा-धो कर तैयार हो जाने का फैसला किया ताकि बाहर निकल कर कुछ खा पी लिया जाए। लगभग 13:00 बजे के आसपास हम सब बाहर निकले और सामने ही एक रेस्टोरेंट की ओर चल पड़े। सामने सड़क पर कारें अपनी गति में आ-जा रही थी। सड़क पार करने के लिए हम किनारे आकर खड़े ही हुए थे कि सामने से आ रही कार हमारे पास आ कर रुक गई। उसके पीछे बाकी कारें भी रुक गईं । हमें कुछ समझ नहीं आया। सामने वाले कार एक महिला चला रही थीं। हम दोनों की नजरें मिलीं, पर अभी दिल धड़का ही था कि उन्होंने हाथ से सड़क पार करने का इशारा किया। हम थोड़े अचंभित थे। सड़क पार कर रेस्तरॉ की ओर जाते समय दिमाग में बहुत से ख्याल आ रहे थे – इन महिला ने मुझे देख कर कार क्यों रोकी? क्या मैं इन महिला को जानता था? क्या मैं उनसे कभी पहले मिला? ऑस्ट्रिया की तो यह मेरी पहली ट्रिप थी? क्या वह कभी इंडिया आई थी? मेरे साथ के बाकी दोस्तों ने भी कहा कि वह शायद वह तुम्हें जानती थी इसलिए कार रोक दी। भूख लगी थी सो हमने फटाफट कुछ खाया और आराम करने होटल लौट आए।

“लेओबिन” शहर में इस कस्बे का नाम था “डोनाविट्ज़”। जगह छोटी थी और शाम को हम मेजबान के साथ पैदल ही निकल पड़े। शाम को 6:30 पर खाने के लिए निकल पड़ना हम भारतीयों की आदत से बिल्कुल अलग था पर मेजबान का सम्मान करते हुए हम उनके साथ चले जा रहे थे। मैने आगे बढ़ कर सड़क पार करने का प्रयास किया, महिला ने मुझे देख कर कार फिर से रोक दी थी। इससे पहले कि मैं समझ पाता कि ये वो महिला नहीं थीं जिन्होंने दोपहर में कार रोकी थी, मेरे मेजबान ने मुझसे अनुरोध किया कि मैं सड़क पार करने के लिए जेब्रा क्रासिंग का प्रयोग करूं। ये ऐहसास कि दोपहर मे जिस महिला ने कार रोकी थी वो मुझसे परिचित नहीं थी मुझे थोड़ा मायूस कर रहा था पर सुकचाते हुए मैने अपने मेजबान से पूछ ही लिया कि माज़रा क्या है? उन्होंने बताया कि सड़क पर पैदल चलने वाला व्यक्ति अपनी अवस्था के आधार पर सबसे कमजोर है इसालिए इस देश में उसके अधिकार सबसे अधिक हैं। वो पैदल इसालिए नहीं चल रहा क्योंकि उसके पास कार नहीं है बल्कि इसलिए चल रहा है क्योंकि अभी पैदल चलना उसकी जरूरत है। क्रमशः साईकल चलाने वाले के अधिकार पैदल वाले से कम, मोटर साईकल वाले के उससे कम और कार वाले के सबसे कम हैं। नियम के अनुसार सड़क पार करने के लिए हम जेब्रा क्रासिंग का प्रयोग करते हैं और अगर कोई जेब्रा क्रासिंग से अलग सड़क पार करने का प्रयास करता है तो ये मान कर कि वो जरूर किसी जरूरत में है हम किसी भी दुर्घटना की संभावना से बचने के लिए अपनी कार या अन्य वाहन रोक कर उन्हें सड़क पार करने का अवसर देते हैं। आप सबके साथ भी शायद दोपहर में ऐसा ही कुछ हुआ होगा।

हम अचंभित थे और हमारी आंखों के सामने पिछली शाम दिल्ली की वो घटना घूम गई जब एक कार लगभग हमसे टकरा ही गई थी, चलाने वाले ने अपशब्द भी कहे थे और हमसे ये पूछ्ने का प्रयास किया था कि आखिर हमने पैदल चलते समय इस बात का ध्यान क्यों नहीं रखा कि पीछे से उसकी एक बड़ी सी मंहगी कार आ रही है।

तो पहली बात ये समझ आई कि दूसरों का सम्मान व दूसरों की सुविधा को वरियता देना इस देश के लोगों के स्वभाव मे है। अगर आप शक्तिशाली हैं तो आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप अपनी शाक्ति का उपयोग कमज़ोर को सहारा देने के लिए करेंगे न कि उनके शोषण के लिए। सड़क पर नियम का पालन इनकी अपनी इच्छा और दूसरों के प्रति इनकी भावनाओं की वजह से है न कि नियम तोड़ने पर मिलने वाले दंड की वजह से।

ऑस्ट्रिया में प्राकृतिक सुंदरता भरी पड़ी है। वियना यहां की राजधानी है, लिंज एक औद्योगिक शहर है और ग्राज प्राकृति और छुट्टियां बिताने के लिए प्रसिद्ध है। वैसे पहला सप्ताह हमने डोनाविट्ज (लेओबिन) में बिताया और शुक्रवार को दोपहर बाद हमारे मेजबान एक बार फिर हमें लौंग ड्राइव पर लिंज की ओर ले कर चल पड़े थे। रास्ते में हमने कुछ ऐसे इलाके देखे जो प्राचीन समय में लोहे और इस्पात के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध थे। पुरानी ब्लास्ट फरनेस के अवशेष आज भी वहां हैं।

शाम होने से पहले ही हम लिंज में थे। भारतीय खाने के लिए बेकरार हम “ताजमहल” रेस्तरां पहुंचे और लगभग एक सप्ताह बाद कुछ भारतीय स्वाद मिला। वैसे इस रेस्तरां के मालिक मूल रुप से कराची से हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में परिस्थिति जो भी हो पर सुदूर पश्चिम में भारतीय, पाकिस्तानी, श्रीलंका या बंग्लादेशी रेस्तरां को भारतीय रेस्तरां, I mean Indian रेस्तरां, कहलाने में कोई ऐतराज़ नहीं है। अगले दिन तक हमने “रॉयल बाम्बे पैलेस” भी खोज लिया था जहां लुधियाना के बिट्टू भाई स्वाद के मामले में ताजमहल से बेहतर थे। सप्ताह में एक दिन जब रायल बाम्बे पैलेस बंद होता था तो बिट्टू भाई ने हमें एक चाइनीज़ रेस्तरां “चीनूज़” में जाने की सलाह दी। आश्चर्य तब हुआ जब लिंज रेलवे स्टेशन के पास इस चाइनीज़ रेस्तरां के मालिक ने हमसे हिन्दी में बात की। इस रेस्तरां को चलाने वाले दो भाई चाइनीज़ मूल के हैं पर चीनियों के उस समाज से आते हैं जो एक बड़ी तादाद में कोलकता में रहते हैं।

वैसे ऑस्ट्रिया लगभग जर्मनी ही है। इनका स्वभाव और संस्कृति जर्मनी से मेल खाती है। यहां के लोग “कॉफी” और “बीयर” के शौकीन हैं। देश के कुछ हिस्सों मे “बॉडी बिल्डिंग” बहुत लोकप्रिय है। असल में “ऑरनाल्ड श्वाजनेगर” मूल रुप से ऑस्ट्रिया से है। द्वितीय विश्व युद्ध और उसके कारणों ने ऑस्ट्रिया को जर्मनी से दूर कर दिया। जर्मनी, ऑस्ट्रिया कुछ ऐसे देश है जिन्होंने अंग्रेजी का सहारा लिए बिना भी विश्व में अपनी पहचान बनाई है। इसलिए इन देशों में आप मात्र अपनी अंग्रेजी की दक्षता के आधार पर सफल हो जाएं ऐसा हमेशा संभव नहीं।

लिंज में तो भारतीय खाना आसानी से सुलभ था पर हमें अक्सर डोनाविट्ज़ के वो दिन याद आ जाते थे। सड़क पार करना और कारों के रुकने की घटना के बाद मेजबान के साथ चाइनीज़ खाना हमें आस बंधा रहा था। इस छोटे से कस्बे डोनाविट्ज मे कोई भारतीय रेस्तरां नहीं था और ग्रुप में स्वाद और शाकाहारी भोजन की जरूरत को ध्यान में रख कर हम ये निर्णय कर चुके थे कि हम रोज चायनीज़ हो खाएंगे। शाकाहारी दोस्तों को भी अंडे से परहेज नहीं था और पांच दिन तो यहां बिताने ही थे। सोमवार अच्छा बीता था पर मंगलवार की शाम जब हम भारतीय आदत के अनुसार लगभग 8:00 बजे के बाद खाने के लिए बाहर निकले तो देखा सड़कें सूनसान थीं, दुकाने बंद हो चुकी थी और हमारे पसंदीदा चायनीज़ रेस्तरां पर एक बड़ा सा ताला लटक रहा था। अचानक ही हम आठ दो दलों में बंट चुके थे। एक दल दूसरे को कोस रहा था कि उनकी वजह से आज हम देर से बाहर निकले, दुकाने बंद हो गई और अब आज भूखा ही सोना पड़ेगा। शोर कुछ बढ़ गया, गश्त लगा रही पुलिस की गाड़ी ने दिशा पारिवार्तित की और हमारे पस आ कर रुक गई। शायद हम सभी देखने मे सभ्य ही लग रहे थे इसलिए ऑफिसर ने विनम्रता से अपनी जर्मन भाषा में टूटी फूटी अंग्रेजी मिला कर हमारी परेशानी पूछी। परेशानी समझते ही उन्होंने हमें बताया कि एक और चायनीज़ रेस्तरां पास ही है पर वो भी बंद ही होने वाला होगा इसालिए हमें वहां जल्दी जाना होगा।

हम लगभग दौड़ते हुए जब वहां पहुंचे तो एक चाइनीज महिला अपने दो बेटों के साथ दिन भर की कमाई का हिसाब कर रही थी।
हमें देखते ही उन्होंने कहा : वेलकोमन्

(स्वागत है)

हममें से किसी को भी जर्मन भाषा नहीं आती थी पर “वेलकम मैन” सुन कर हमारी छाती गर्व से चौड़ी हो गई।

हमने कहा – थैंक्यू

उन्होंने कहा : वालन ज़ी एटवास ऐसेन?

(क्या आप कुछ खाना चाहेंगे?)

जर्मन समझे बिना बस कुछ अंदाज़ लगा, हमारे ग्रुप से एक सदस्य ने तत्परता से कहा- नो, ऐसन इज़ इन जर्मनी, वी आर फ्रॉम इडिया।

उन्होंने कहा : यस यस इंडिया आबेर एटवास त्जू एसेन वॉलेन?

(यस यस इंडिया, पर क्या आपको कुछ खाना है?)

हमारे मित्र तत्पर थे सो कहा : डोंट वरी, वी हैव वूलेन, आवर जैकेट्स आर हॉट

अब उनके दोनो पुत्र उनके पीछे आ चुके थे और मंद-मंद मुस्करा रहे थे। मुझे लगा कि कुछ गड़बड़ है

सो मैने पूछा : इंग्लिश

उन्होने कहा : नो – दिस इज़ ऑस्ट्रिया – जर्मन – वी चाइनीज़ – नो इंग्लिश

मैने पूछा : मेन्यू कार्ड

उन्होने मेन्यू सामने कर दिया, सब कुछ जर्मन में लिखा था। हम सब थोड़ा हताश हो गए।

खैर पूछा : वेजिटेरियन?

उन तीनों के चेहरे पर कोइ परिवर्तन नहीं हुआ। ये समझते हुए कि हम दोनों एक दूसरे को बिल्कुल भी समझ नहीं पा रहे, हमारे एक मित्र नें जरा ऊंची आवाज में लगभग चिल्ला कर कहा : वी आर इंडियन, वी नीड वेजिटेरियन, नो मीट

तो हमारे एक और मित्र ने पीछे से आवाज़ दी : रे छोरी नै बस त्हारी भसा ना आवै, पर बहरी ना सै।

पूरी स्थिति थोड़ी हास्यास्पद होती जा रही थी।

मैंने पूछा : एग?

उन्होंने कहा : आय?

हममें से एक ने कहा – उसको समझ नहीं आ रहा

मैनें कहा : एग…. एग

उन्होने कहा : आय

कैसे समझाएं, अचानक याद आया – ड्राइंग इज़ द लैंग्वेज ऑफ इंजीनियर्स, मैने इशारा किया कि हम कुछ लिखना चाहते हैं, उन्होंने हमें एक कागज़ और पेन दे दिया।

मैने उसपर एक अंडा बनाया और उन्हें दिखाते हुए कहा : एग

अन्होंने फिर कहा : आय यस आय

हमें शक हुआ कि शायद जर्मन में अंडे को आय कहते हैं। पर हमारे बीच के एक बड़े इंजीनियर ने मुझसे कागज छीन कर अंडे के बगल में एक मुर्गी बनाने की कोशिश की।

अब उनका एक बेटा बोल पड़ा : टर्की …. टर्की

हमने फिर कहा : नो वी आर नॉट टर्किश, वी आर इंडियन

खैर महिला ने कहा : ओ के – आय (इशारा अंडे की तरफ था) उण्ड राइस?

हम सब उछल पड़े – समझ आ गया

मैंने पूछा : यू सेड राइस?

उनका बेटा भी चालाक था, अंदर से कुछ कच्चे चावल ले आया

हम सब ने एक सुर में कहा : यस… यस…

पर इंजीनियर्स आशवस्त हो जाना चाहते थे तो एक ने कागज पर पतीला बनाया, उसके नीचे आग बनाई और उन्हें इशारे से बताया कि ने ऐसे कच्चे चावल पतीले के पानी में डाल दें और पतीले को आग पर रखें।

अब हम आश्वस्त हो चुके थे सो बैठ गए। उन लोगों ने भी प्रेम से हमारे लिए खाना बनाया। ये एग करी और राइस जैसी कुछ चीज़ थी। स्वाद पूरा था।

इस पूरे वार्तालाप में हम दोनो पक्षों ने अपनी-अपनी ओर से एक ऐसी भाषा का प्रयोग किया था जो दूसरे पक्ष को नहीं आती थी, फिर भी हम सफल थे। उस दिन शायद उस रेस्तरां मे हम आठ इंजीनियर्स और उन तीन रेस्तरा वालों के अलावा जर्मन, चाइनीज़ और हिन्दी भाषाएं भी थीं और हमारे प्रयास पर मंद मंद मुस्करा रही थी। खाने के बाद उन चाइनीज़ ने हमे प्रेम पूर्वक “प्लम वाइन” दी। वाइन की चुस्की लेते हुए हमने बाहर देखा। सड़क सूनी थी पर लाइटें जल रही थी। उसी हल्की रोशनी मे शायद अंग्रेजी थी, जो एक पेड़ के पीछे दुबकते हुए हमसे नजरें चुरा रही थी।

 

टिप्पणी: लेख में व्यक्त किए गए विचारों एवं अनुभवों के लिए लेखक ही उत्तरदायी हैं। संस्थापक/संचालक का लेखक के विचारों या अनुभवों से सहमत होना अनिवार्य नहीं है।

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