आज़ादी का शहर-एम्सटर्डम

पहला भाग:

वो अलसाई सी सुबह एक नए शहर में। पर ये सुबह ख़ास थी। हम दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत और अनोखे शहरों में से एक, नीदरलैंड की राजधानी एम्स्टर्डम में थे।

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रात में थके हुए होटल पहुंचे तो आंखों में बस नींद थी। दिन भर के ऑफिस के बाद रात की फ़्लाइट लेने के तनाव ने घूमने के उत्साह को थोड़ी देर के लिए ढाप लिया था। इसलिए पिछली रात तो बस थकान उतारने में गुज़र गई। पर गुनगुनी धूप लिए ये सुबह अच्छी लग रही थी। अरे टाइम क्या हुआ है ? मैंने एकदम से पूछा। किसी भी होटल में चले जाओ, सब कुछ होगा सिवाय दीवार घड़ी के । मेरे घर के हर कमरे में मुझे घड़ी की आदत है ताकि वक़्त से आगे रह सकूँ। यहाँ ९ बज चुके थे और अगर हमें आज शहर का ट्रिप पूरा करना था तो हमें जल्दी सिटी सेंटर पहूँचना था । हम मैरियट होटल में रुके थे जो एयरर्पॉर्ट के पास पर शहर से थोड़ा दूर था। सुबह की कॉफी के बाद होटल में अच्छे नाश्ते ने शरीर में ताजगी भर दी। और हम तैयार थे अपनी तीन दिन की एमस्टर्डम यात्रा के लिए। 

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होटल से शहर के केंद्र तक पहुंचने के लिए स्पेशल ट्रेन चलती है। यूरोप की ट्रेन का सफ़र अपने आप में वैसे ही रोमांचक और आनंद भरा होता है। साफ़ सुंदर कम भीड़ भाड़ वाली सवारी। होटल से निकले थे तो हल्की धूप थी पर धीरे धीरे आसमान को काले बदलाओं ने घेर लिया। गूगल बाबा से मौसम का हाल चाल पूछा तो पता चला अगले कुछ घंटे बारिश होनी थी। बारिश अच्छी है पर कहीं घूमने गए हो तो यही लगता है की इंद्र देवता अब कुछ दिन ना बरसो तो बेहतर है । पर कौन सा इंडिया में इंद्र देवता हमारी सुनते थे जो अब यहाँ सुनेंगे। अब क्या करें। चलो ट्रैवल डेस्क पे पूछते हैं। ट्रेन पास भी लेना था। नीदरलैंड का पब्लिक ट्रांसपोर्ट काफ़ी अच्छा है, पर जर्मनी में रहने के बाद अब जाने अनजाने हम हर जगह के पब्लिक ट्रांसपोर्ट की तुलना जर्मनी से अनायास ही करने लगते हैं। जर्मनी में पब्लिक ट्रांसपोर्ट विश्वास पे चलता है।आप हर दिन का अलग टिकट लें, या कुछ  दिनों या महीने का पास लें और बिना किसी रोज़मर्रा की चेकिंग के कहीं भी घूमें। कभी कभी चेकिंग ज़रूर होती है और पास ना होने पे अच्छा फ़ाइन भी लग सकता है पर रोज़ रोज़ के चेकिंग का कोई झंझट नहीं होता। ख़ैर हॉलंड में थोड़ा अलग हिसाब था। काफ़ी कुछ दिल्ली मेट्रो और लंदन जैसा। इन आउट चेकिंग गेट्स थे और पास के बगैर आप अंदर बाहर नहीं जा सकते। और ख़ास बात ये कि ट्रेन हो या बस हर बार अंदर जाते हुए और बाहर निकलते हुए आपको अपना टिकट पंच करना ज़रूरी है। भूल गए और कहीं चेकिंग हुई तो अच्छा फ़ाइन देना पड़ सकता है । अलग अलग तरह के टिकट थे और हमने ३ दिन का पास ख़रीद लिया ताकि बिना बार बार की झंझट के बिना तीन दिन आराम से घूम सकें । 

तो अगले कुछ घंटो की बारिश के कारण और ट्रैवल एजेंट की सलाह अनुसार हमने सुबह सुबह फ़ैरी राइड यानी नाव से शहर की सैर का प्लान फाइनल किया। हमारी फ़ैरी थी एक नीले सफेद रंग की आधी खुली और आधी बंद छोटी सी नाव जिसमें हमारे अलावा करीब तीस लोग और थे।  एक घंटे के इस नौका विहार से अच्छी दिन की शुरुआत और हो ही नहीं सकती थी। नहरों के शहर एमस्टर्डम को नाव से देखने का एक अलग ही मज़ा है और कुछ नज़ारे आप सिर्फ इस पानी के रास्ते ही देख सकते हैं। फ़ैरी राइड के बाद हम थोड़ी देर सिटी सेंटर में घूमते रहे। जहां एक ओर एमस्टर्डम का सहेज कर रखा गया वास्तुशिल्प आकर्षित करता है वहीं शहर के बीचों बीच सड़कों पर बिछा हुआ ट्रेन और ट्राम का जाल, कई अंडर कंस्ट्रक्शन इमारतें, भीड़ भाड़ परेशान भी करता है। पूरे हॉलैंड में साइकिल बहुत ज्यादा लोकप्रिय हैं पर हर कोई यहां साइकिल चला नहीं सकता। अगर आप साइकिल ट्रैक में चल रहे हैं तो कोई नहीं साइकिल वाला आपको उड़ा कर जा सकता है। इसलिए हमें ट्रैवल एजेंट ने सावधान किया कि यहां की खूनी साइकिल्स से बच के रहें। 

ऐनी फ्रैंक हाउस और जिंजर ब्रेड हाउस देखने के बाद हम एक कैफे में बैठे। वहां पे कृष्णा और शिव जी की तस्वीरें देख के थोड़ा हैरानी हुई। नीचे लिखा था, शुद्ध अफ़ीम। लोग हुक्का लगा रहे थे और हवा में इतनी अफ़ीम थी कि आप खुद पियो ना पियो फरक नहीं पड़ता, फेफ़डों में कुछ मात्रा तो जरूर जाएगी। नहरों का ये शहर एम्स्टर्डम बहुत सी चीजों के लिए प्रसिद्ध है: खूबसूरत ऐतिहासिक इमारतें, कई संग्रहालय, नहरें, ऐनी फ्रैंक हाउस, और विशेषतह रेड लाइट डिस्ट्रिक्ट और भांग चरस आदि के लिए । अपने सभी रूपों में कैनबिस एम्स्टर्डम में वैध है पर हैरानी की बात है कि सार्वजनिक जगहों पर शराब पीना गैरकानूनी है। खैर हम हंसते हुए कॉफी पी के स्टेशन सेंट्रल स्टेशन की ओर निकल पड़े। 

एमस्टर्डम सेंट्रल बस और ट्रेन स्टेशन एक साथ हैं और बेहद ख़ूबसूरत बने हुए हैं । नीचे के तल पे दुकानें हैं, रेस्तरां हैं और ऊपर ट्रेन और बस स्टेशन। उसी से लगा हुआ है फ़ेरी स्टेशन जहाँ से बड़ी बड़ी फ़ेरी यानी जहाज़ लोगों को, उनकी साइकल्ज़ के साथ, स्कूटर्ज़ के साथ नदी के इस पार से उस पार पहुंचाते हैं। हज़ारों लोग हर साल इस ७०० साल पुराने शहर में इसके ऐतिहासिक आकर्षणों, कला संग्रह, और सदियों पुरानी नहरों की ख़ूबसूरती को निहारने आते हैं। पर सबसे ज्यादा ऐम्स्टर्डैम जिसके लिए सबसे ज़्यादा जाना जाता है वो है आज़ादी। अलग अलग लोग इसे अपने हिसाब से परिभाषित कर सकते हैं, अच्छे बुरे की श्रेणी में रख सकते हैं, पर इतना तो है, यहाँ की हवा में आते ही आप भी कुछ पल के लिए ही सही बेपरवाह ज़रूर हो जाते हो। और घुमक्कडों के लिए तो अगर ऐम्स्टर्डैम नहीं देखा तो समझिए यूरोप नहीं देखा। 

ऐम्स्टर्डैम बेहद लोकप्रिय टुरिस्ट स्पॉट है, शाम होते होते एहसास होने लगा था। पर मज़ा तो तब आया जब रात के २ बजे सारी सड़कों को भरा हुआ पाया, सब मस्ती में । कम से काम १०-१५ भारतीय पूरे दिन भर में हमें मिल ही गए जो अलग अलग जगहों से आए हुए थे। रात में यूँ विचरने वालों में युवा बैचलर्ज़ ही ज़्यादा थे । 

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हम नाइट लाइफ़ देखना चाहते थे इसलिए पब क्रॉल के टिकट्स ले लिए जिसमें हमें ६ पब्स में एक ग्रूप में लेके जाने का कार्यक्रम था। इंडिया से दो दोस्त भी हमारे ग्रूप में थे जिनमें से एक ऐसा जो ज़िंदगी भर पढ़ाई कर कर के, पर्फ़ॉर्मन्स मोड़ में रह के उकता गया था और अब ‘हैलो जिंदगी’ , ‘ ज़िंदगी ना मिलेगी दुबारा’ से पूरा प्रेरित था। उसने बहुत कोशिश की कि कोई अंग्रेज़ लड़की उसके साथ डांस करने लगे पर बात करने की हिम्मत नहीं थी। हम दोनो उसे चढ़ा रहे थे की जाओ, ट्राई करो, पर वो बेचारा घबरा रहा था। २-३ लड़कियों के पास गया भी पर किसी ने घास नहीं डाली तो चुपचाप हँसता हुआ आके बैठ गया। तभी क्लब में ४ लड़कियों के ग्रुप ने फ़िल्मी अन्दाज़ में एंट्री की। पार्टी में रौनक़ आ गई। अपने भारतीय होने का फ़र्ज़ निभाते हुए अपने भारतीय भाई की परेशानी सुलझाने के लिए मैंने कमर कसी। आखिर इतनी दूर से बेचारा आया था, जिंदगी जीने की ख्वाहिश लिए, इतना फ़र्ज़ तो बनता था मेरा। तो उस ग्रूप के साथ मैंने डांस करना शुरू किया और फिर सबको बुला लिया। बस फिर तो हमारे हिंदुस्तानी भाई ख़ुशी और जोश से भर गए। मुझे उसमें तमाशा फ़िल्म के रणवीर कपूर और हर उस कोटा की दलदल झेले लडके की  झलक आ रही थी जो अपने माता पिता के सपने पूरे करने के बाद आखिरकार इंजिनियर बनके अब एमस्टर्डम आया है अपनी जिंदगी जीने। जिसकी मां को नहीं पता कि बेटा नॉन वेज खाता है और शराब पीता है, हशीश तो दूर की बात है। हाहा । वैसे यहाँ बात दूँ की हम दम्पत्ति बहुत सीधे साधे हैं और हमारे लिए ये सिर्फ़ एक आध्यात्मिक यात्रा थी। 

खैर ८ बजे से पब का कार्यक्रम शुरू हुआ और पहले पब में घुसने के बाद छंठा पब आते आते रात के २ बज चुके थे। आखिरी पब सबसे अच्छा था लेकिन हम बूरी तरह थक चुके थे। इसलिए ३ बजे खाते पीते किसी तरह होटल पहुंचे और ढेर हो गए।

– योजना जैन 

टिप्पणी: लेख में व्यक्त किए गए विचारों एवं अनुभवों के लिए लेखक ही उत्तरदायी हैं। संस्थापक/संचालक का लेखक के विचारों या अनुभवों से सहमत होना अनिवार्य नहीं है।

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