लाल किले में देखें जलियांवाला बाग !

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मित्रों, दिल्ली के लाल किले से हम सब परिचित हैं। मुगल बादशाह शाहजहां के बनवाए स्थापत्य कला के इस बेहतरीन नमूने का हममें से अधिकतर कभी न कभी दीदार भी कर चुके हैं। यहां के दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास सहित तमाम हिस्से पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहे हैं। इतना होते हुए भी यदि आपने पिछले दो-तीन वर्षों से लाल किला नहीं देखा है तो आपके लिए यहां अब बहुत कुछ नया है। आइए एक बार फिर लाल किले को मेरे साथ मेरे अंदाज में देखें।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस संग्रहालय

वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस और आजाद हिंद फौज से संबंधित संग्रहालय का उद्घाटन किया था। इसमें प्रवेश करते ही आप कंप्यूटरीकृत प्रणाली के माध्यम से उन्हें नमन कर सकते हैं। इसी के साथ गैलरी की ओर जाते हुए उनके कई विशाल चित्रों से आप रूबरू होते हैं। मुझे तो उनके साथ फोटो खिंचवाकर गौरव का अनुभव हुआ। इसके बाद विभिन्न गैलरियों में नेताजी के बचपन से लेकर उनकी उपलब्ध अंतिम तस्वीर तक आपको उनके राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत विशाल व्यक्तित्व और कृतित्व के दर्शन कराती है। आजाद हिंद फौज के सेनानियों, उनकी वर्दियों, उस दौर के अखबारों, कागजातों आदि के माध्यम से हम उनके राष्ट्र के लिए संघर्ष और बलिदान से रूबरू होते हैं।

स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय

लालकिले में काफी पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संग्रहालय की स्थापना हुई थी, लेकिन इसे पिछले कुछ वर्षों में और अधिक समृद्ध किया गया है।

इस संग्रहालय में 1857 से लेकर आजादी की संघर्ष गाथा, महत्वपूर्ण कलाकृतियां और अन्य यादगार सामग्री मौजूद है। इसमें अधिकांश दिल्ली और लालकिले से जुड़ी है।

पत्रकार होने के कारण गैलरी के दो चित्रों ने मुझे खास प्रभावित किया। 1857 की जंगे आजादी के दौरान दिल्ली से “अखबार-उज-जफर” निकालने वाले मौलवी मोहम्मद बाकिर शहीद होने वाले पहले पत्रकार थे। उनके बारे में यहां जानकरी मौजूद है। इसी के साथ बॉम्बे क्रोनिकल के संपादक ब्रिटिश नागरिक बी.जी. हॉर्निमैन को जलियांवाला बाग नरसंहार पर लिखने के कारण देश से निर्वासित कर दिया गया था। गैलरी में हॉर्निमैन का जिक्र “कलम की ताकत” शीर्षक से है।

अंग्रेंजों के खिलाफ बगावत करने पर 1946 में आजाद हिंद फौज के तीन अधिकारियों जनरल शाहनवाज खान, कर्नल प्रेम सहगल का कोर्ट मार्शल लाल किले में ही किया गया था। इसे भी संग्रहालय में जगह दी गई है। जंगे आजादी के दौरान काला पानी कहे जाने वाले अंडमान-निकोबार की सेल्युलर जेल को भी संग्रहालय में दर्शाया गया है।

जलियांवाला बाग को विशेष महत्व

संग्रहालय में 1919 में पंजाब के हालात और जलियांवाला बाग नरसंहार का विस्तार से वर्णन है। यहॉ मौजूद चित्रों और अन्य जानकारी देख हुकूमते बरतानिया के भारतीयों से अमानवीय व्यवहार को देखकर रौंगटे खड़े हो जाते हैं। जलियांवाला बाग में शहीद होने वाले अब्दुल करीम को उस दौर के समाचारपत्र अभ्युदय ने “पंजाब के बली” कहकर संबोधित किया था। उसकी कॉपी भी यहां देखी जा सकती है।

प्रथम विश्व युद्ध और भारत

संग्रहालय में प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय जवानों के हालात पर भी एक गैलरी है। इसमें एक ओर उनके पराक्रम का वर्णन है, वहीं उस दौर के विपरीत हालातों पर भी प्रकाश डाला गया है। फ्रांस, इस्राइल और जर्मनी आदि देशों में आज भी इन भारतीयों को आदर से याद किया जाता है। इसके बारे में भी बताया गया है।

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एक भारतीय सैनिक की युद्धस्थल पर पीड़ा का वर्णन

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कला वीथिका भी आकर्षण का केंद्र

आप यदि कला प्रेमी हैं तो लाल किले में आपके लिए भी बहुत कुछ है। पिछले दो-तीन सौ वर्षों के दौरान के प्रमुख चित्रकारों के काम को यहां आप देख सकते हैं। यहां ब्रिटिश यात्री थॉमस डेनियल और उनके भतीजे विलियम डेनियल के 1786 से 1793 के बीच भारत भ्रमण के दौरान बनाए रेखाचित्र और छायाचित्र उस दौर के परिदृश्यों और इमारतों का नयनाभिराम दर्शन कराते हैं। ये चित्र ब्रिटेन में (1795-1808) में प्रकाशित हुए थे।

मैं कला के बारे में कुछ खास नहीं जानता, फिर भी कला वीथिका में मेरा कब एक घंटा गुजर गया पता ही न चला।खास बात यह है कि यहॉ बच्चों के लिए भी रंग और कैनवस मौजूद है। वे यहां चित्रकारों से प्रेरणा लेकर खुद भी चित्र बना सकते हैं।

ई-टिकट लेना रहेगा फायदेमंद

लाल किले में प्रवेश के लिए आपको टिकट लेना होगा। खिड़की से लेने की जगह डेबिट/क्रेडिट कार्ड या पेटीएम जैसे एप की मदद से ई-टिकट लें, यह सस्ता पड़ेगा। लाल किले में प्रवेश से पूर्व चाय-नाश्ता आदि करके चलें, क्योंकि अंदर इसकी व्यवस्था नहीं है। पानी की बोतल भी साथ लेना उचित रहेगा।

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कुल मिलाकर किशोरावस्था में देखे लाल किले को देखने का इस बार अनुभव बहुत अलग रहा। मेरी मित्रों को सलाह है कि आप भी मेरे अंदाज में एक बार फिर “कुछ समय तो गुजारिए दिल्ली के लाल किले में….”

-प्रवीण वशिष्ठ

टिप्पणी: लेख में व्यक्त किए गए विचारों एवं अनुभवों के लिए लेखक ही उत्तरदायी हैं। संस्थापक/संचालक का लेखक के विचारों या अनुभवों से सहमत होना अनिवार्य नहीं है।

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