क्या आप कैलास पर्वत जाना चाहते हैं !

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10 जनवरी 2020: क्या आप कैलास पर्वत जाना चाहते हैं!!!

यदि हाँ लेकिन किसी वजह से नहीं जा पाए तो कम से कम विशाखापत्तनम के “कैलासगिरि हिल्स” तो जा ही सकते हैं। विशाखापत्तनम में लगभग 570 फीट ऊँची कैलासगिरि हिल्स पर तक़रीबन 380 एकड़ में विकसित किया गया “कैलासगिरी पार्क” शहर को दिया गया एक नायाब तोहफ़ा है।

यहाँ पर हवा में उड़ने का भी मज़ा है मतलब पार्क तक पहुँचने के लिए केबल कार की सवारी का लुत्फ़ लिया जा सकता हैं और ऊपर जाते-जाते शहर, सड़क और समंदर का जो विहंगम नज़ारा देखने को मिलता है उसके तो कहने ही क्या। पहाड़ी के ऊपर बने इस पार्क तक पहुँचने के लिए सड़क से भी जाया जा सकता है।

पार्क में प्रवेश करते ही दर्शन होते हैं 40 फ़ीट ऊँची विशालकाय भगवान शिव व् माँ पार्वती की सफ़ेद प्रतिमा के, मानो भोले बाबा अपनी अर्धांगनी के साथ साक्षात् विराजमान हैं कैलास पर्वत पर। एक ऊँचे चबूतरे पर विशाल प्रतिमा तक पहुँचने के लिए दोनों तरफ बनी चमकदार रेलिंग वाली सीढ़ियां और दोनों सीढ़यों के बीच लगी सीढ़ीनुमा फुलवारी, यह नज़ारा किसी भी पर्यटक को विस्मित कर देना वाला था।

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जब केबल कार से पार्क तक पहुंचे थे तो कैलासगिरि पार्क में शिव – पार्वती की प्रतिमा के दर्शन करने से पहले रूबरू हुए थे एक रेलवे ट्रैक से और वहाँ बने एक छोटे लेकिन हूबहू असली रेलवे स्टेशन जैसे रेलवे स्टेशन से। “यहाँ से कौन सी ट्रेन चलती है और आख़िर जाती कहाँ हैं ?” मन ने खुद से ही सवाल किया था। टिकट खिड़की से पता चला कि यहाँ चलने वाली यह टॉय ट्रेन पर्यटकों को पार्क के चारों और घुमाती है और ट्रेन में बैठे बैठे ही मज़ा ले सकते हैं पार्क का भी और ट्रेन से दिखने वाली वादियों का भी, फिर क्या, टिकट लिया और लगे ट्रेन का इंतज़ार करने।

यूँ तो लगता है कि ट्रेन का सफ़र झंझट है लेकिन जॉय राइड का ये विकल्प वहाँ मज़ेदार लगा। एसी व नॉन एसी कोच में से हमने एसी का विकल्प चुना था। बीस मिनट बाद ट्रेन आ गई , एसी कोच में केवल हमारा ही ग्रुप था ऐसा लगा मानो हमने ट्रेन ख़रीद ली हो। हमारे कोच का अटेंडेंट भी मज़ेदार था, मन भर कर फ़ोटो लिए थे उसने हमारे। ट्रेन में बैठ कभी संकरी झाड़ियों से गुज़रते और कभी ट्रेन से पार्क में बनी कलाकृतियों को निहारते और कभी वादियों में खो जाते। बिना थकान के लगभग आधे घंटे में इतने बड़े पार्क को इस टॉय ट्रेन की मदद से घूम लेना, सच बताऊं तो एक अजूबा ही है। पहाड़ के ऊपर केवल मनोरंजन के लिए ट्रैक बनाना और ट्रेन चलाने की सोच को भी सलाम करना तो बनता ही है।

डायनासोर के प्रतिरूप, झूले और पावर क्रिकेट जैसे मनोरंजन के विकल्प तो हैं ही साथ ही साथ है एक शिव मंदिर, फ्लोरल क्लॉक व् अन्य कुछ आकर्षण। घूमना ना भूलिएगा।

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-सचिन देव शर्मा

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