वैष्णव आस्था का केंद्र है सिम्हाचलम मंदिर

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सिम्हाचलम पर्वत का प्रवेश द्वार 

10 जनवरी 2020 : श्री वराह लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर यानी सिम्हाचलम मंदिर भगवान विष्णु के प्रमुख मंदिरों में से एक है। यह वैष्णव सम्प्रदाय की आस्था का एक प्रमुख केंद्र है। आंध्र प्रदेश के सबसे बड़े शहर विशाखापत्तनम में लगभग एक हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर के मुख्य देवता हैं भगवान श्री वराह लक्ष्मी नरसिम्हा। यह मंदिर कितना प्राचीन है इस बारे में कोई पक्की जानकारी तो नहीं है लेकिन मंदिर में लगे हुए शिलालेखों से इसकी प्राचीनता के बारे में कुछ अंदाज़ा लगाया जा सकता है।चोला वंश के शासक कुलोत्तुंगा द्वारा लगाया गया शिलालेख ग्यारहवीं शताब्दी का है जबकि दूसरा शिलालेख जो कलिंग साम्राज्य की ईस्टर्न गंगा वंश की रानी द्वारा प्रतिमा पर सोने का पत्तर चढ़वाने के बारे में है वह बारहवीं शताब्दी का है। एक अन्य शिलालेख के अनुसार पूर्वी गंगा वंश के शासक नरसिम्हा देव ने तेरहवीं शताब्दी में मुख्य मंदिर का निर्माण कराया। सोलहवीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य में प्रसिद्ध शासक राजा कृष्णदेव राय ने मंदिर के दो बार दर्शन किए और कई गांव व बहुमूल्य आभूषण मंदिर को दान दिए। इन बहुमूल्य आभूषणों में से एक बहुमूल्य पन्ना का हार आज भी मंदिर में है।

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सिम्हाचलम मंदिर परिसर 

पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु ने अपने वराह अवतार और अपने नरसिंह अवतार में क्रमशः हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप का वध कर भक्त प्रहलाद की रक्षा की। माना जाता है कि प्रह्लाद ने भगवान से प्रार्थना की कि वराह और नरसिंह अवतार के सयुंक्त रूप में वहीं पर भगवान की एक प्रतिमा के रूप में विराजमान हो जाएं, विष्णु भगवान ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। भक्त प्रह्लाद ने वहीं पर मंदिर बना प्रतिमा को स्थापित कर दिया। ऐसा भी माना जाता कि जैसे जैसे समय बीतता गया मंदिर का क्षय होता गया और प्रतिमा धरती में विलुप्त हो गई।

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राजगोपुरम ( मुख्य प्रवेश द्वार )

कालांतर में एक बार चंद्रवंशी राजा पुरुरवा उर्वशी नामक अप्सरा के साथ सिम्हाचलम में भ्रमण के लिए गए तो उर्वशी को को स्वप्न में वहाँ पर धरती में भगवान की दबी हुई मूर्ति होने के बारे में ज्ञात हुआ। राजा पुरुरवा ने प्रतिमा को बाहर निकलवाया लेकिन बहुत ढूंढने के बाद भी प्रतिमा के पैर नहीं मिले। राजा प्रतिमा के पैर ना मिलने से चिंतित थे तभी किसी दैवीय आवाज़ ने उन्हें बताया कि वो चिंता ना करें भगवान की प्रतिमा अपने इस रूप में अपने भक्तों को मोक्ष प्रदान करने में सक्षम है। दैवीय शक्ति ने उर्वशी को स्वप्न में यह भी निर्देश दिया कि प्रतिमा को अक्षय तृतीया के अलावा हमेशा चंदन का लेप लगाकर रखा जाए।

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मंदिर परिसर में निकलती धार्मिक शोभायात्रा 

चंदन का लेप लगाकर प्रतिमा को रखने की इस परंपरा का पालन आज भी किया जाता है। चंदन का लेप लगाकर रखने से प्रतिमा शिव लिंग की भांति दिखती है। हर अक्षय तृतीया को चंदनोत्सवम के दौरान चंदन के लेप को हटाया जाता है और भगवान के निजरूप के दर्शन भक्तों के लिए खोल दिए जाते हैं। निजरूप दर्शन केवल बारह घंटे के लिए ही संभव होता है उसके बाद प्रतिमा को पुनः चंदन का लेप लगा दिया जाता है।

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दर्शन के लिए पंक्ति प्रबंधन 

भगवान वराह लक्ष्मी नरसिम्हा का यह मंदिर अतिविशाल है। इसमें तीन बाहरी बरामदे व पाँच गेट हैं। मंदिर का स्थापत्य ओड़िया, चालुक्य व चोला स्थापत्य शैली का है। मंदिर एक रथ की संरचना लिए है। मंदिर में 96 स्तंभों का एक कल्याण मंडप मतलब विवाह मंडप भी है। मंदिर का गर्भ गृह वर्गाकार है, गर्भगृह के ऊपर पिरामिड आकर का छत है। गर्भगृह के आगे एक बरामद है जिसके ऊपर भी पिरामिड आकार की छत है। बरामदे के आगे सोलह स्तंभों का मुखमंडपम है। मंदिर में एक कप्पास्थम्बम है, ऐसा विश्वास किया जाता है कि जो भक्त शुद्ध मन से इस स्तम्ब को अपनी भुजाओं में भरकर कोई मुराद मांगता है तो उसकी मुराद पूरी होती है। मंदिर परिसर के पास ही प्राकृतिक झरने के पानी का स्रोत है जिसको गंगाधर कहा जाता है ऐसा माना जाता है कि जो भी विश्वास के साथ इस झरने में स्नान करता है उसके सब पाप धुल जाते हैं उसकी बीमारियाँ भी ठीक हो जाती हैं और सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। मंदिर परिसर में ही वराह पुष्करणी नामक तालाब है ऐसा माना जाता है कि भगवान वैंकटेश्वर ने स्वयं इस तालाब में स्नान किया था।

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मंदिर परिसर में रखा हुआ एक रथ 

कुल मिलाकर भगवान वराह नरसिम्हा भगवान का यह मंदिर पौराणिक,धार्मिक, ऐतिहासिक तथा स्थापत्य की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। वैष्णव परम्परा को सहेज कर रखने और आगे बढ़ने में इस मंदिर का बहुत बड़ा योगदान है। यदि आप विशाखापत्तनम जाए तो मंदिर जाकर भगवान वराह नरसिम्हा के दर्शन ज़रूर कीजिएगा।

-सचिन देव शर्मा

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